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Tuesday, September 29, 2026

जै बोलो ......

 

कट गई देश की नाक, जै बोलो।

बेशक छान रहे खाक, जै बोलो।

 

झूठ के बाज़ार में सच बोलोगे,
बन जाओगे मज़ाक, जै बोलो।

 

वेंटिलेटर पर है अचेत प्रगति,
आँकड़ों की मची है धाक, जै बोलो।

 

भूखा ढूँढ रहा कूड़े में रोटी,
फ़ाइल है ठीक-ठाक, जै बोलो।

 

विकास के विशाल पोस्टर को
नंगे बच्चे रहे हैं ताक, जै बोलो।

 

बेबस को बिठाकर सामने देखो,
भाषण की देंगे खुराक, जै बोलो।

 

‘वर्मा’ रुक गया उस देहरी पर,
जहाँ है रक्तसनी फ्रॉक, जै बोलो।

Monday, August 24, 2026

अच्छे स्कूलों से दस नुकसान

 

आजकल हर ओर "स्कूल सुधारो अभियान" की चर्चा है, मैंने अपने रिसर्च में पाया कि स्कूल सुधर गये तो नुकसान ही नुकसान है। शोधपत्र के कुछ बिंदु निम्नवत हैं : - 

1. बच्चे सवाल पूछने लगते हैं

फिर हर बात पर “क्यों?” पूछते हैं— और यह आदत परिवार से लेकर ज्यादातर सत्ता तक को बेचैन कर सकती है।

2. बच्चे तर्क करना सीख जाते हैं

हर घटना को तर्क की कसौटी पर कसने लगते हैं। वे “चोरी तो हुई, पर चोर कोई नहीं है” जैसी अवधारणाओं को मानने से इनकार कर देते हैं।

3. अंधविश्वास पर संदेह करने लगते हैं

हर बात को आँख मूँदकर मानने के बजाय प्रमाण माँगने लगते हैं। इससे अंधविश्वास ही नहीं,
अंधभक्ति की जड़ें भी हिलने लगती हैं।

4. बच्चे किताबें पढ़ने लगते हैं

और किताबों में लिखी बातों पर विश्वास करने लगते हैं। नतीजा— व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान,
जो उन्हीं के टैक्स के पैसे से प्रसारित किया जाता है, फेल होने के कगार पर पहुँच जाता है।

5. बच्चों में आत्मसम्मान पैदा हो जाता है

फिर उन्हें डराकर, धमकाकर या लालच देकर आसानी से नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।

6. वे गलत को गलत कहने लगते हैं

चाहे गलत करने वाला कितना ही बड़ा, प्रभावशाली या सम्मानित क्यों न हो। वे निडर होकर गलत को गलत कहने लगते हैं।

7. बच्चे बराबरी की बात करने लगते हैं

सत्ता के अचूक हथियार— जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी और पद— को वे निरस्त करने लगते हैं। उन्हें इंसान दिखाई देता है, उसकी हैसियत नहीं।

8. वे सत्ता से भी सवाल पूछ सकते हैं

और सबसे बड़ा नुकसान— वे सार्वजनिक रूप से घोषित कर सकते हैं कि “हमारा काम सिर्फ ताली और थाली बजाना नहीं है।”

9. वे अपने भविष्य का फैसला खुद लेना चाहते हैं

और अगर वे अपने भविष्य का फैसला खुद करने लगेंगे, तो उन्हें भीड़ बनाना आसान नहीं रहेगा।

10. सबसे बड़ा नुकसान—
वे अच्छे नागरिक बन सकते हैं। फिर उन्हें झूठे वादों, डर, नफरत और दिखावे से बहकाना आसान नहीं रहेगा। और यही तो सत्ता का ब्रह्मास्त्र होता है।

Friday, August 14, 2026

संसद में कुत्ता

 

एक बार संसद में
एक कुत्ता घुस गया।

 

सभी सांसद
घबराकर अपनी-अपनी सीटों के पीछे छिपने लगे।

 

तभी एक अनुभवी सांसद ने कहा—

 

“घबराइए नहीं,
ये बेवजह नहीं काटता।”

 

एक सांसद ने पूछा—
“तो फिर
किसे काटता है?”

 

अनुभवी सांसद मुस्कुराया—

“जो
इसके रास्ते में आ जाए।”

 

तभी दूसरा सांसद बोला—

“फिर तो चिंता की कोई बात नहीं…”

पहला बोला—
“क्यों?”

 

वह बोला—

“हम तो इतने वर्षों से
सिर्फ़ रास्ते बदलने में
माहिर हैं।”

 

कुत्ता कुछ देर
संसद को देखता रहा…

फिर चुपचाप बाहर चला गया।

 

शायद उसे समझ आ गया था—

यहाँ काटने का काम
पहले से ही
बहुत कुशलता से हो रहा है।

Sunday, August 9, 2026

भारत विकसित राष्ट्र है — संदेह करना राष्ट्र का अपमान है!

 

कुछ लोग पूछते फिर रहे हैं कि भारत विकसित राष्ट्र है या नहीं। ऐसे लोगों पर मुझे दया आती है। ये बेचारे विकास को पहचानते ही नहीं। इन्हें लगता है कि विकास का मतलब कारखाने, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिकों का जीवन स्तर होता है। ये लोग बहुत पुरानी किताबें पढ़ते हैं।

आज विकास की परिभाषा बदल चुकी है।

सरकार यदि दिन में दस बार विज्ञापन देकर बता रही है कि विकास हो रहा है, तो फिर विकास हो ही रहा है। आखिर विज्ञापन झूठ बोलने के लिए थोड़े ही बनाए जाते हैं! अगर टीवी पर नदी साफ़ दिख रही है, तो नदी साफ़ ही होगी। जो गंदगी देख रहे हैं, उन्हें शायद अपना चश्मा बदल लेना चाहिए।

औद्योगिक विकास भी खूब हुआ है। पहले लोग सिर्फ़ सामान बनाते थे। अब अवसर बनाए जाते हैं। पेपर लीक एक बड़ा उद्योग है। रिश्वत उद्योग तो इतना विकसित हो चुका है कि बिना किसी सरकारी संरक्षण के पूरे देश में फल-फूल रहा है। दलाली, कमीशन, फर्जीवाड़ा और चढ़ावा-प्रबंधन—ये सब आत्मनिर्भर भारत के सफल मॉडल हैं। इन उद्योगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें कभी मंदी नहीं आती।

अर्थव्यवस्था का हाल भी शानदार है। कुछ लोग कहते हैं कि रुपया डॉलर के सामने कमजोर हो रहा है। कितनी नासमझी की बात है! रुपया कमजोर नहीं, विनम्र हो रहा है। दुनिया को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश देने वाला देश अपनी मुद्रा को भी अहंकारी कैसे होने देगा?

और नेताओं की संपत्ति को देखिए। चुनाव के समय जो संपत्ति शपथपत्र में होती है, पाँच साल बाद वह कई गुना हो जाती है। इससे बड़ा आर्थिक विकास और क्या होगा? अगर एक जनप्रतिनिधि अपनी निजी अर्थव्यवस्था को इतनी तेजी से विकसित कर सकता है, तो मान लेना चाहिए कि देश सही हाथों में है। विकास पहले प्रतिनिधि तक पहुँचता है, फिर धीरे-धीरे जनता तक आने की तैयारी करता है। जनता को धैर्य रखना चाहिए; विकास भी आखिर वीआईपी है।

अब भी यदि किसी को भारत के विकसित राष्ट्र होने पर संदेह है, तो दोष भारत का नहीं, उसकी आँखों का है। उसे विकास कम और वास्तविकता ज़्यादा दिखाई देती है। ऐसी दृष्टि लोकतंत्र में बहुत कष्ट देती है।

मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा जब हम विकास की परिभाषा ही बदल देंगे। फिर कोई विवाद नहीं रहेगा। क्योंकि जिस देश में परिभाषाएँ बदलने की शक्ति हो, उसे विकसित राष्ट्र बनने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

Thursday, August 6, 2026

गधा आगे क्यों निकला?

 

एक बार घोड़ों की रेस हो रही थी। न जाने कैसे, एक प्रभावशाली 

व्यक्तित्व वाला महत्वाकांक्षी गधा भी उसमें शामिल हो गया।

 

लोग हैरान थे— "भला गधा घोड़ों से कैसे जीत पाएगा?"

 

रेस शुरू हुई और कुछ देर बाद समाप्त भी हो गई।

 

नतीजा आया तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सबसे आगे 

गधा था।

 

लोगों ने उत्सुकता से पूछा, "इतने तेज़-तर्रार घोड़ों के बीच तुम 

जीत कैसे गए?"

 

गधा मुस्कुराया और बोला—

 

"मैंने बस इतना कहा था—


'
तुम सब मेरे पीछे-पीछे चलो, मैं तुम्हें गंतव्य तक पहुँचने का 

शॉर्टकट रास्ता बताता हूँ।'

 

बस... वे मेरे पीछे चल पड़े, चलते रहे और मैं जीत गया।"


Wednesday, July 29, 2026

भैंस का नार्को टेस्ट

 

जज: तुम्हारे ऊपर आरोप है कि जिस व्यक्ति की सुपारी तुम्हें दी गई थी, उसकी जगह तुमने किसी और की हत्या कर दी। क्या तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो?

आरोपी: हुज़ूर, हत्या तो मैंने की है, पर यह गलती मेरी नहीं है ... गलत पता बताने वालों की वजह से गलत आदमी मर गया। चार्जशीट में दर्ज है कि मैं लाईसेंसी हत्यारा हूँ - मैं यह गलती कर ही नहीं सकता।

जज: विस्तार से बताओ।

आरोपी: हुज़ूर, मुझे हिदायत दी गई थी—"अगली गली में जिस घर के आगे भैंस बैठी मिले, उसी घर के मालिक को मार देना। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि भैंस का रंग काला बताया गया था।"

जज: ठीक है ... ठीक है, सारी भैंसे काली होती है यह बताओ को फिर क्या हुआ?

आरोपी: जब मैं वहाँ पहुँचा, भैंस दूसरे घर के सामने बैठी थी। मैंने समझा कि वही लक्ष्य है। आखिर मैं सुपारी किलर हूँ, सर्वेक्षक नहीं।

सरकारी वकील: यानी गलत हत्या की वजह भैंस बनी?

आरोपी: जी हुज़ूर, अगर भैंस अपनी निर्धारित जगह पर बैठी रहती, तो यह दुर्घटना कभी नहीं होती।

(कुछ देर अदालत में सन्नाटा छा जाता है।)

जज (फैसला सुनाते हुए):
अदालत ने समस्त तथ्यों, परिस्थितियों तथा भैंस की संदिग्ध गतिविधियों पर गंभीरता से विचार किया।

प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि हत्या की वास्तविक प्रेरक, सहायक एवं परिस्थितिजन्य अभियुक्त उक्त भैंस है।

अतः—

  1. वर्तमान मुकदमा तत्काल प्रभाव से खारिज किया जाता है।
  2. पुलिस भैंस के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की उपयुक्त धाराओं में एफआईआर दर्ज करे।
  3. आवश्यकता पड़ने पर भैंस का नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट तथा डीएनए परीक्षण भी कराया जाए।
  4. यदि भैंस जमानत का आवेदन दे, तो उसका कड़ा विरोध किया जाए, क्योंकि उसके फरार होकर किसी अन्य घर के सामने बैठ जाने की प्रबल आशंका है।

जज (हथौड़ा बजाते हुए):
"असली अपराधी चाहे जितना शक्तिशाली हो, कानून के हाथ... भैंस तक भी पहुँच सकते हैं।"

अदालत स्थगित।

Monday, July 13, 2026

आपदा में अवसर

राष्ट्र के समस्त सलाहकारों को निर्देश दिया गया था— "आपदा में अवसर खोजो।"

लक्ष्य स्पष्ट था— उसे वोट में बदलना।

लंबे मंथन और गंभीर विमर्श के बाद सर्वसम्मति से एक योजना बनी—

"जब भी कोई महामारी फैले, जनता को ऐसी वैक्सीन दी जाए जो शरीर से अधिक दिमाग पर असर करे; जो प्रतिरोधक क्षमता नहीं, बल्कि धार्मिक वैमनस्य, अंधविश्वास और मूढ़ता बढ़ाए।"

योजना लागू हुई।

महामारी आई।

वैक्सीन के नाम पर सोशल मीडिया के माध्यम से नारों, अफ़वाहों और नफ़रत की एक स्मार्ट वैक्सीन बाँटी गई।

कुछ लोग बीमारी से मर गए, कुछ लोग डर के साथ जीने लगे और कुछ लोग सोचने की क्षमता खो बैठे।

फिर चुनाव हुए।

महामारी समाप्त हो गई, लेकिन घोषणा की गई कि खतरा अभी बाकी है। नए-नए आँकड़ों, संदेशों और प्रचार के सहारे
भय का वातावरण बनाए रखा गया।

और इसीलिए स्मार्ट वैक्सीन का वितरण जारी रहा—

जिसका असर आज भी कायम है,
और जो हर दिन
समाज को नए सिरे से संक्रमित कर रही है।

Sunday, July 5, 2026

जांच समिति का झुनझुना (लघुकथा)

एक राजा ने एक भव्य इमारत बनवाने का निर्णय लिया। विज्ञापन निकले। नामी निर्माणकर्ताओं ने आवेदन किया, पर ठेका कुछ मशहूर चोरों को मिला। निर्णय स्वयं राजा ने लिया।

राजा ने चोरों को अलग बुलाकर कहा—
“मैं जानता हूँ तुम चोर हो। इसलिए ही चुना है। इमारत ऐसी बननी चाहिए कि लोग उसकी तारीफ करें, और साथ ही चोरी का पूरा इंतज़ाम भी रहे। चोरी तुम करोगे, और उसका बड़ा हिस्सा मेरे निजी ख़ज़ाने में जाएगा।”

चोर मुस्कुरा दिए।

कुछ ही दिनों में इमारत बन गई—मज़बूत, भव्य, सुरक्षित। भीतर एक गुप्त मार्ग भी था, जिसे केवल चोर जानते थे।

रातें चोरी में बदल गईं। समझौते के अनुसार हिस्सा बंटता रहा—ऊपर राजा, नीचे चोर। व्यवस्था “सफल” थी।

फिर एक दिन गुप्त मार्ग खुल गया।

जनता भड़क उठी। सड़कों पर भीड़ उतर आई—न्याय, जाँच और दंड की माँग।

राजा मुस्कुराया और बोला—
“मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ। शायद आपको पता नहीं कि इसके लिए मैंने एक जांच समिति बना दी है। जो चोर हैं, उन्हें दंड मिलेगा। और तब तक एक नई इमारत बनाई जाएगी—पहले से अधिक भव्य, पहले से अधिक सुरक्षित।”

भीड़ एक क्षण को मौन रही… फिर ताली बजाई।
कुछ ही देर में मैदान “महाराज की जय” से गूंज उठा।

बहुमत का विरोध समाप्त हो गया, पर कुछ हाथों में उठी तख्तियाँ अब भी स्वीकृति में नहीं झुकी थीं।

और इधर, चोरों ने नई इमारत का नक्शा खोल लिया था—
इस बार गुप्त मार्ग पहले से भी अधिक चौड़ा था।

Saturday, June 13, 2026

प्रजा चुप क्यो थी?!

विक्रम के कंधों पर लदे वेताल ने एक कथा सुनाई—

एक नगर में एक राजा था। उसके राज्य में अपराधियों को संरक्षण प्राप्त था, स्त्रियाँ असुरक्षित थीं, भूख से लोग मर रहे थे और न्याय दम तोड़ चुका था। जब स्त्रियों को सरेआम निर्वस्त्र कर अपमानित किया जाता या अन्य जवाबदेही से बचकर राजा चुप्पी का दामन थाम लेता। आमतौर पर वह उसी समय किसी मंदिर में भव्य अनुष्ठानों का आयोजन कर धर्मरक्षक होने का स्वांग रचता।

वेताल ने पूछा—
"राजन, इतना अन्याय होने पर भी प्रजा राजा के विरुद्ध मौन क्यों थी?"

विक्रम ने वेताल के कान में उत्तर दिया—
"क्योंकि उस राज्य में धर्म, करुणा और न्याय का मार्ग न रहकर प्रदर्शन और पाखंड का उपकरण बन चुका था। लोगों को प्रश्न पूछने के बजाय जयकार करना सिखा दिया गया था।"

उत्तर सुनते ही वेताल ठहाका लगाकर फिर उसी पेड़ से जा लटका।

Sunday, May 13, 2012

जो नंगा है , वही चंगा है .....


(वैधानिक चेतावनी : यहाँ शारीरिक नंगई को कोई स्थान नहीं है)
नंगा होने का सुख नंगा ही जान पायेगा. वस्तुत: नंगई एक नैसर्गिक गुण है जो अर्जित भी की जा सकती है और विरासत में भी मिल सकती है. नंगई के लिए आवश्यक संसाधन है माँ-बहन की गालियाँ. यह भी साधना से अर्जित की जाती है. वैसे भी आजकल के सीरियलों और तथाकथित ‘रियलिटी शोज’ में यह बखूबी प्रयोग की जाती है और वहाँ से भी अर्जित की जा सकती है.
समाज के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें यह अतिआवश्यक गुण की श्रेणी में आते हैं, उनमें से कुछ प्रमुख हैं : राजनीति, ठेकेदारी, भाईगिरी, उठाईगिरी आदि. प्रथम दो क्षेत्रों (राजनीति, ठेकेदारी) में यह थोड़े परिमार्जित रूप में परिलक्षित होती है पर अन्य दो क्षेत्रों (भाईगिरी, उठाईगिरी) में यह अपने नैसर्गिक रूप में ही कारगर है.
यहाँ बाथरूम या हरम में नंगे को नंगई के रूप में नहीं देख सकते. क्योंकि ऐसा करने से शायद ही कोई नंगई के इलज़ाम से बच पाये. यहाँ की चर्चा में केवल सार्वजनिक रूप से नंगे ही शामिल हैं. सार्वजनिक नंगई में लिप्त आमतौर पर वैयक्तिक नंगई से परे भी होते हैं.
नंगई को साध चुके समाज के हर क्षेत्र में अपने कार्य संपादन में इसका चतुराई से प्रयोग करते हैं. कई तो नंगई से अपने कार्य को संपन्न करवाने के उपरांत नंगई के खिलाफ प्रवचन देते दिख सकते हैं, जैसा आमतौर पर राजनीति में देखा जा सकता है.
नंगई का असली स्वरूप इस उदाहरण से स्पष्ट हो सकता है :
दृश्य : परीक्षास्थल (काल्पनिक)
आब्जरवर ने सामूहिक नकल पकड़ लिया और सेंटर के खिलाफ पत्र तैयार कर ही रहा है कि तभी एक लड़की (प्रायोजित) आब्जरवर के खिलाफ नक़ल चेकिंग के दौरान अनावश्यक रूप से स्पर्श, यानी छेडछाड का आरोप लगाने वाला पत्र लेकर आ गयी’
निष्कर्ष : आब्जरवर भी वही है, कोई शिकायत भी नहीं हुई, सभी सानन्द हैं और नक़ल जारी है.
मेरे एक मित्र का पुत्र (मात्र ४ वर्षीय) नैसर्गिक रूप से अर्जित किये हुए गुण का बखूबी प्रदर्शन किया. जब वे बाजार में थे तो उनका पुत्र एक खिलौने की जिद कर बैठा और मना करने पर वहीं नंगा हो गया. मजबूरन वह खिलौना उन्हें खरीदना ही पड़ा.
अस्तु, ये उदाहरण साबित करने को पर्याप्त हैं कि नंगई एक सात्विक ही नहीं कारगर गुण है.
कहना ही पडेगा “जो नंगा है,  वही चंगा है”

Thursday, June 2, 2011

यह मेरे नाक का सवाल है ..

‘यह मेरे नाक का सवाल है ..’ अक्सर यह जुमला मुझे परेशान करता रहा है. आखिर नाक का वह सवाल है क्या? क्या नाक सवाल भी करता है? और अगर करता है तो सवालों से लगातार घिरे होने के बावजूद नाक के सवाल के प्रति हम इतने सचेत क्यों रहते हैं? वैसे जहाँ तक मैं जानता हूँ उसके अनुसार, “नाक रीढ़धारी प्राणियों में पाया जाने वाला छिद्र है। इससे हवा शरीर में प्रवेश करती है जिसका उपयोग श्वसन क्रिया में होता है। नाक द्वारा सूँघकर किसी वस्तु की सुगंध को ज्ञात किया जा सकता है।“

वैसे तो नाक आँखो के मध्य स्थित होता है, पर यह सर्वदा आँखों से ओझल ही होता है. इसीलिये इसकी ऊँचाई और सलामती की खबर दूसरे ही रखते हैं. बिना नाक वाला भी हमेशा दूसरों की निगाह में स्वयं को नाक वाला साबित करने के प्रयत्न में लगा रहता है. क्योकि नाक मानव शरीर में सबसे ऊँचा स्थल होता है (यदि स्थितियाँ सामान्य हों तो) अत: इसके क्षतिग्रस्त होने की; कटने की सम्भावना सर्वदा बरकरार रहती है. यूँ तो मक्खियों के लिये यह प्रिय स्थल है पर लोग नाक पर मक्खियों का बैठना बिलकुल पसन्द नहीं करते हैं.

यूँ तो नाक कई प्रकार के होते हैं, पर ऊँची नाक वालों की नाक सबसे नाजुक होती है. इसके कटने की सम्भावना बनी रहती है, फिर भी लोग नाक ऊँची रखना ही पसन्द करते हैं. नाक ऊँची रखने का शौक मानव सभ्यता में बहुत प्राचीन है. रामायण, महाभारत से लेकर अन्य अनेक महायुद्धों का सम्बन्ध इसी नाक से है. नाक की सलामती का यह शौक विकृति के चरम तक पहुँच चुका है. तथाकथित ‘आनर’ का सम्बन्ध नाक से ही है जिसके कारण मानव सभ्यता (!!) को ‘आनर कीलिंग’ तक का सफर करना पड़ता है.

सौन्दर्य का आकलन भी नाक से ही प्रारम्भ होता है। ‘नाक-नक्श’ देखकर ही लोग रिश्ते बनाते हैं, फब्तियाँ कसते हैं या छेड़ने तक का दुस्साहस कर जाते हैं। छेड़ने की प्रक्रिया में ‘छिड़े’ और ‘छेड़े’ दोनों की नाक को खतरा पैदा हो जाता है और इसके कटने की सम्भावना बन जाती है।

और जहाँ नाक को कटने से बचाने की इतनी जद्दोजहद हो, वहाँ नकेल का आना लाज़मी है। नाक का सीधा सम्बन्ध नकेल से है। इसकी ख़ासियत है कि इसके एक सिरे का सम्बन्ध तो नाक से होता है पर दूसरे सिरे का नियंत्रण किसी और के हाथ में होता है। विडंबना देखिए, अपनी नाक ऊँची रखने का दावा करने वाला आम इंसान अपनी नकेल व्यवस्था, बाज़ार या रूढ़ियों के हाथ में सौंपे बैठा है, और मज़ेदार बात यह है कि उसे इस बात का एहसास भी नहीं है।

आप सबकी नाक सलामत रहे। आपने इस आलेख को पढ़कर मेरी नाक रख ली। धन्यवाद!

Thursday, December 16, 2010

पेट्रोल की कीमत नहीं बढ़ी : मंगतू का गणित

मैं हमेशा स्कूटर में पेट्रोल 100 रूपये का डलवाता हूँ. अक्सर मेरे साथ मंगतू होता है और वह देखता रहता है. कल से पेट्रोल की कीमत में वृद्धि की खबर वह सुन रहा था और परेशान हो रहा था (हर आम आदमी की तरह).  आज भी वह मेरे साथ जा रहा था, रास्ते में स्कूटर में रिजर्व लग गया और अगले पेट्रोल पम्प पर मैं 100 रूपये का पेट्रोल डलवाया. मंगतू चुपचाप देखता रहा, पर घर आकर बोला :

"ये टी वी वाले और अखबार वाले झूठ कह रहे है."

मैनें पूछा "क्या झूठ कह रहें हैं अखबार और टी वी वाले?"

मगतू : अरे! यही कि पेट्रोल की कीमत में भारी बढोत्तरी हुई है.

मैं        : पर बढोत्तरी तो हुई है.

मंगतू : अगर बढोत्तरी हुई होती तो आपको पैसे ज्यादा देने होते, पर आपने इस बार भी तो 100 रूपये ही दिये हैं, फिर कीमत कहाँ बढ़ी ????


Friday, October 29, 2010

ईलाज ठीक चल रहा है ~~

मंगतू बीमार हो गया. आनन-फानन में उसे अस्पताल पहुँचाया गया. अस्पताल में अब उसके स्वास्थ्य में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है.  जब डाँक्टर से उसके बीमारी के बारे में पूछा गया तो डाँक्टर ने बताया कि :

'मंगतू के शरीर के आंतरिक अवयव मिलावटी भोज्य पदार्थ को ग्रहण करने और पचाने के आदी हो चुके हैं. शायद उसने किसी दिन विशुद्ध भोजन कर लिया होगा और बीमार हो गया.'

यह पूछने पर कि अस्पताल में आकर इतनी जल्दी कैसे ठीक हो गया तो डाँक़्टर ने जो बताया वह कम चौकाने वाला नहीं है :

'हमने यहाँ पर उसे एक नकली और मिलावटी इंजेकशन  लगा दिया और उसके भोजन को मिलावटी बना दिया गया है साथ ही प्रदूषित आक्सीजन का मास्क भी लगाया गया है.'

मुझे लगा ईलाज ठीक चल रहा है.

Sunday, October 17, 2010

आवश्यकता है : एक रावण की ~~

आवश्यकता है :

एक रावण की

योग्यता :

मायावी होना,

जो अगले साल -

दशहरा पर्व तक

फिर से खड़ा हो जाये;

जो इस साल के कद से

अगले साल और बड़ा हो जाये;

छल, क्षद्म, अनाचार-व्यभिचार

विशेष योग्यता मानी जायेगी.

हरण-अपहरण में

दक्ष होना आवश्यक है. 

उसे खुद पर वार कर सकने योग्य

'राम' की तलाश खुद करनी होगी.

(हम तलाश करने में नाकाम रहे हैं)

यह उसकी विशेष योग्यता होगी,

इच्छुक तुरंत सम्पर्क करें.

अब तक के वारदातों का

बायोडाटा साथ लायें,

पहले आओ-पहले पाओ

का लाभ उठायें.

(नोट : भारतीय नेता कृपया सम्पर्क न करें)

विश्व रेडक्रास दिवस

विश्व रेडक्रास दिवस
विश्व रेडक्रास दिवस पर कविता पाठ 7 मई 2010

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ
हिन्दी दिवस 2009

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

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