Thursday, October 22, 2026

रावण मारा गया

 

रामलीला ग्राउंड में
अवशेष देख आया।

यक़ीनन,
रावण मारा गया।

प्रश्न यह नहीं
कि किसने मारा
और क्यों?

शायद अब नहीं जलेगा
मणिपुर,
शायद अब नहीं लुटेगी
नाबालिगों की अस्मत।

शायद बंदूको से अब

आग नहीं

फूल बरसेंगे

शायद ....

शायद ....

बस,
निश्चिंत हो जाइए
कि वह अब
सिर नहीं उठाएगा।

और अगर
वह
फिर अस्तित्व में आ भी गया—
तो क्या हुआ!

अगले साल
फिर मारेंगे।

Saturday, October 10, 2026

स्वयंभू विजेता

वह हर हाल में जीतने का आदी था। प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही वह अपने प्रतिद्वंद्वियों को धमकाकर, उनकी कमजोरियाँ उजागर करके और अपनी ताकत का प्रदर्शन करके उनका मनोबल तोड़ देता। अक्सर आधे मुकाबले तो मैदान में उतरने से पहले ही जीत लिए जाते थे।

लेकिन इस बार उसका सामना एक ऐसे खिलाड़ी से होने वाला था, जो न उसकी धमकियों से डरता था और न ही उसके रसूख से प्रभावित होता था।

खिलाड़ी को पहली बार अपनी हार का अंदेशा होने लगा। उसने अपने गुंडों को रास्ते में तैनात कर दिया। प्रतिद्वंद्वी जिस विमान से आ रहा था, लैंड होते ही उसे घेर लिया गया और एक गुप्त स्थान पर पहुँचा दिया गया।

निर्धारित समय पर प्रतियोगिता शुरू हुई। प्रतिद्वंद्वी का स्थान खाली था। खिलाड़ी ने स्वयंभू ढंग से खुद को विजेता घोषित कर दिया। उसके पाले हुए लोग तालियाँ बजाने लगे और उसकी 'अजेय छवि' का गुणगान करने लगे।

मीडिया के कैमरे मुस्तैदी से उसकी नकली मुस्कान को 'ऐतिहासिक जीत' के रूप में कवर कर रहे थे। बिक चुकी पुलिस बाहर पहरा दे रही थी—अपराधियों को बचाने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई को अंदर आने से रोकने के लिए।

Wednesday, October 7, 2026

...और रास्ता बंद हो गया

एक औरत बाजार से लौट रही थी। उसके हाथ में सिंदूर की एक छोटी-सी डिबिया थी। रास्ते के किनारे निर्माण कार्य से निकले कुछ पत्थर पड़े थे। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह लड़खड़ा गई। उसके हाथ से सिंदूर की डिबिया छूटकर पत्थरों पर जा गिरी। डिबिया का ढक्कन खुल गया और सारा सिंदूर पत्थरों पर बिखर गया।

औरत ने कुछ देर तक बिखरे हुए सिंदूर को समेटने की कोशिश की, लेकिन पत्थरों की दरारों और आसपास की मिट्टी में मिला सिंदूर समेटना संभव नहीं था। अंततः उसने खाली डिबिया उठाई और घर चली गई।

अगली सुबह उधर से गुजर रहे एक व्यक्ति की नजर उन पत्थरों पर पड़ी। लाल सिंदूर से रंगे पत्थर उसे किसी देवी की आकृति जैसे दिखाई दिए। उसने आसपास के लोगों को बुलाया। देखते-देखते यह बात फैल गई कि वहां देवी प्रकट हुई हैं। किसी ने पत्थरों को देवी का रूप मानकर फूल चढ़ाए, किसी ने अगरबत्ती जलाई और किसी ने माथा टेक दिया। थोड़ी ही देर में वहां भीड़ जमा हो गई।

एक महिला ने बताया कि पिछली रात उसे सपने में इसी देवी के दर्शन हुए थे। बस, इस एक बात ने लोगों के विश्वास को और मजबूत कर दिया। धीरे-धीरे उस जगह को पवित्र मान लिया गया। अगले सप्ताह वहां बाँस और टाट का एक छोटा-सा छप्पर डाल दिया गया। लोगों ने चंदा देना शुरू किया। कुछ महीनों में चबूतरा बना, फिर चारदीवारी उठी और कुछ वर्षों में उसी जगह एक भव्य मंदिर खड़ा हो गया।

अब हर मंगलवार और शनिवार वहां श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगती थी। दूर-दूर से लोग मन्नतें लेकर आते, पत्थर पर सिंदूर चढ़ाते और दानपेटी में अपनी श्रद्धा अर्पित करते। उस छोटे-से पत्थर के बारे में अब कई कथाएं प्रचलित थीं। कोई उसे स्वयंभू देवी कहता तो कोई उसके चमत्कारों की नई-नई कहानियां सुनाता।

कई वर्षों बाद वही औरत उस रास्ते से गुजरी। अचानक मंदिर देखकर उसके कदम रुक गए। वह कुछ देर तक उसे देखती रही। फिर उसकी नजर मंदिर के भीतर स्थापित उसी पत्थर पर पड़ी। उसने उसे तुरंत पहचान लिया।

उसने पास खड़े एक श्रद्धालु से पूछा, “यह मंदिर कब बना?”

आदमी ने श्रद्धा से सिर झुकाते हुए कहा, “बहुत पुराना है। कहते हैं, एक दिन माता स्वयं यहां प्रकट हुई थीं। तभी से यह जगह पवित्र मानी जाती है।”

औरत ने उसकी बात सुनी। कुछ कहना चाहा, लेकिन चुप रह गई। उसने अपने हाथ में पकड़ी वही पुरानी सिंदूर की खाली डिबिया देखी और हल्के से मुस्कुराई।

फिर वह आगे बढ़ना चाही, लेकिन बढ़ नहीं पाई। रास्ता बंद था। जिस रास्ते से वह वर्षों पहले गुजरी थी, उसी रास्ते पर अब मंदिर खड़ा था।

वह कुछ क्षण मंदिर को देखती रही और फिर लौट गई।

घंटियाँ बदस्तूर बजती रहीं। मंदिर रास्ता निगलकर गर्व से खड़ा था।

Tuesday, September 29, 2026

जै बोलो ......

 

कट गई देश की नाक, जै बोलो।

बेशक छान रहे खाक, जै बोलो।

 

झूठ के बाज़ार में सच बोलोगे,
बन जाओगे मज़ाक, जै बोलो।

 

वेंटिलेटर पर है अचेत प्रगति,
आँकड़ों की मची है धाक, जै बोलो।

 

भूखा ढूँढ रहा कूड़े में रोटी,
फ़ाइल है ठीक-ठाक, जै बोलो।

 

विकास के विशाल पोस्टर को
नंगे बच्चे रहे हैं ताक, जै बोलो।

 

बेबस को बिठाकर सामने देखो,
भाषण की देंगे खुराक, जै बोलो।

 

‘वर्मा’ रुक गया उस देहरी पर,
जहाँ है रक्तसनी फ्रॉक, जै बोलो।

Monday, August 24, 2026

अच्छे स्कूलों से दस नुकसान

 

आजकल हर ओर "स्कूल सुधारो अभियान" की चर्चा है, मैंने अपने रिसर्च में पाया कि स्कूल सुधर गये तो नुकसान ही नुकसान है। शोधपत्र के कुछ बिंदु निम्नवत हैं : - 

1. बच्चे सवाल पूछने लगते हैं

फिर हर बात पर “क्यों?” पूछते हैं— और यह आदत परिवार से लेकर ज्यादातर सत्ता तक को बेचैन कर सकती है।

2. बच्चे तर्क करना सीख जाते हैं

हर घटना को तर्क की कसौटी पर कसने लगते हैं। वे “चोरी तो हुई, पर चोर कोई नहीं है” जैसी अवधारणाओं को मानने से इनकार कर देते हैं।

3. अंधविश्वास पर संदेह करने लगते हैं

हर बात को आँख मूँदकर मानने के बजाय प्रमाण माँगने लगते हैं। इससे अंधविश्वास ही नहीं,
अंधभक्ति की जड़ें भी हिलने लगती हैं।

4. बच्चे किताबें पढ़ने लगते हैं

और किताबों में लिखी बातों पर विश्वास करने लगते हैं। नतीजा— व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान,
जो उन्हीं के टैक्स के पैसे से प्रसारित किया जाता है, फेल होने के कगार पर पहुँच जाता है।

5. बच्चों में आत्मसम्मान पैदा हो जाता है

फिर उन्हें डराकर, धमकाकर या लालच देकर आसानी से नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।

6. वे गलत को गलत कहने लगते हैं

चाहे गलत करने वाला कितना ही बड़ा, प्रभावशाली या सम्मानित क्यों न हो। वे निडर होकर गलत को गलत कहने लगते हैं।

7. बच्चे बराबरी की बात करने लगते हैं

सत्ता के अचूक हथियार— जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी और पद— को वे निरस्त करने लगते हैं। उन्हें इंसान दिखाई देता है, उसकी हैसियत नहीं।

8. वे सत्ता से भी सवाल पूछ सकते हैं

और सबसे बड़ा नुकसान— वे सार्वजनिक रूप से घोषित कर सकते हैं कि “हमारा काम सिर्फ ताली और थाली बजाना नहीं है।”

9. वे अपने भविष्य का फैसला खुद लेना चाहते हैं

और अगर वे अपने भविष्य का फैसला खुद करने लगेंगे, तो उन्हें भीड़ बनाना आसान नहीं रहेगा।

10. सबसे बड़ा नुकसान—
वे अच्छे नागरिक बन सकते हैं। फिर उन्हें झूठे वादों, डर, नफरत और दिखावे से बहकाना आसान नहीं रहेगा। और यही तो सत्ता का ब्रह्मास्त्र होता है।

Friday, August 14, 2026

संसद में कुत्ता

 

एक बार संसद में
एक कुत्ता घुस गया।

 

सभी सांसद
घबराकर अपनी-अपनी सीटों के पीछे छिपने लगे।

 

तभी एक अनुभवी सांसद ने कहा—

 

“घबराइए नहीं,
ये बेवजह नहीं काटता।”

 

एक सांसद ने पूछा—
“तो फिर
किसे काटता है?”

 

अनुभवी सांसद मुस्कुराया—

“जो
इसके रास्ते में आ जाए।”

 

तभी दूसरा सांसद बोला—

“फिर तो चिंता की कोई बात नहीं…”

पहला बोला—
“क्यों?”

 

वह बोला—

“हम तो इतने वर्षों से
सिर्फ़ रास्ते बदलने में
माहिर हैं।”

 

कुत्ता कुछ देर
संसद को देखता रहा…

फिर चुपचाप बाहर चला गया।

 

शायद उसे समझ आ गया था—

यहाँ काटने का काम
पहले से ही
बहुत कुशलता से हो रहा है।

Sunday, August 9, 2026

भारत विकसित राष्ट्र है — संदेह करना राष्ट्र का अपमान है!

 

कुछ लोग पूछते फिर रहे हैं कि भारत विकसित राष्ट्र है या नहीं। ऐसे लोगों पर मुझे दया आती है। ये बेचारे विकास को पहचानते ही नहीं। इन्हें लगता है कि विकास का मतलब कारखाने, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिकों का जीवन स्तर होता है। ये लोग बहुत पुरानी किताबें पढ़ते हैं।

आज विकास की परिभाषा बदल चुकी है।

सरकार यदि दिन में दस बार विज्ञापन देकर बता रही है कि विकास हो रहा है, तो फिर विकास हो ही रहा है। आखिर विज्ञापन झूठ बोलने के लिए थोड़े ही बनाए जाते हैं! अगर टीवी पर नदी साफ़ दिख रही है, तो नदी साफ़ ही होगी। जो गंदगी देख रहे हैं, उन्हें शायद अपना चश्मा बदल लेना चाहिए।

औद्योगिक विकास भी खूब हुआ है। पहले लोग सिर्फ़ सामान बनाते थे। अब अवसर बनाए जाते हैं। पेपर लीक एक बड़ा उद्योग है। रिश्वत उद्योग तो इतना विकसित हो चुका है कि बिना किसी सरकारी संरक्षण के पूरे देश में फल-फूल रहा है। दलाली, कमीशन, फर्जीवाड़ा और चढ़ावा-प्रबंधन—ये सब आत्मनिर्भर भारत के सफल मॉडल हैं। इन उद्योगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें कभी मंदी नहीं आती।

अर्थव्यवस्था का हाल भी शानदार है। कुछ लोग कहते हैं कि रुपया डॉलर के सामने कमजोर हो रहा है। कितनी नासमझी की बात है! रुपया कमजोर नहीं, विनम्र हो रहा है। दुनिया को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश देने वाला देश अपनी मुद्रा को भी अहंकारी कैसे होने देगा?

और नेताओं की संपत्ति को देखिए। चुनाव के समय जो संपत्ति शपथपत्र में होती है, पाँच साल बाद वह कई गुना हो जाती है। इससे बड़ा आर्थिक विकास और क्या होगा? अगर एक जनप्रतिनिधि अपनी निजी अर्थव्यवस्था को इतनी तेजी से विकसित कर सकता है, तो मान लेना चाहिए कि देश सही हाथों में है। विकास पहले प्रतिनिधि तक पहुँचता है, फिर धीरे-धीरे जनता तक आने की तैयारी करता है। जनता को धैर्य रखना चाहिए; विकास भी आखिर वीआईपी है।

अब भी यदि किसी को भारत के विकसित राष्ट्र होने पर संदेह है, तो दोष भारत का नहीं, उसकी आँखों का है। उसे विकास कम और वास्तविकता ज़्यादा दिखाई देती है। ऐसी दृष्टि लोकतंत्र में बहुत कष्ट देती है।

मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा जब हम विकास की परिभाषा ही बदल देंगे। फिर कोई विवाद नहीं रहेगा। क्योंकि जिस देश में परिभाषाएँ बदलने की शक्ति हो, उसे विकसित राष्ट्र बनने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

विश्व रेडक्रास दिवस

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विश्व रेडक्रास दिवस पर कविता पाठ 7 मई 2010

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ

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हिन्दी दिवस 2009

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

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