एक औरत बाजार से लौट रही थी। उसके हाथ में सिंदूर की एक छोटी-सी डिबिया थी। रास्ते के किनारे निर्माण कार्य से निकले कुछ पत्थर पड़े थे। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह लड़खड़ा गई। उसके हाथ से सिंदूर की डिबिया छूटकर पत्थरों पर जा गिरी। डिबिया का ढक्कन खुल गया और सारा सिंदूर पत्थरों पर बिखर गया।
औरत ने कुछ देर तक बिखरे हुए सिंदूर को समेटने की कोशिश की, लेकिन पत्थरों की दरारों और आसपास की मिट्टी में मिला सिंदूर समेटना संभव नहीं था। अंततः उसने खाली डिबिया उठाई और घर चली गई।
अगली सुबह उधर से गुजर रहे एक व्यक्ति की नजर उन पत्थरों पर पड़ी। लाल सिंदूर से रंगे पत्थर उसे किसी देवी की आकृति जैसे दिखाई दिए। उसने आसपास के लोगों को बुलाया। देखते-देखते यह बात फैल गई कि वहां देवी प्रकट हुई हैं। किसी ने पत्थरों को देवी का रूप मानकर फूल चढ़ाए, किसी ने अगरबत्ती जलाई और किसी ने माथा टेक दिया। थोड़ी ही देर में वहां भीड़ जमा हो गई।
एक महिला ने बताया कि पिछली रात उसे सपने में इसी देवी के दर्शन हुए थे। बस, इस एक बात ने लोगों के विश्वास को और मजबूत कर दिया। धीरे-धीरे उस जगह को पवित्र मान लिया गया। अगले सप्ताह वहां बाँस और टाट का एक छोटा-सा छप्पर डाल दिया गया। लोगों ने चंदा देना शुरू किया। कुछ महीनों में चबूतरा बना, फिर चारदीवारी उठी और कुछ वर्षों में उसी जगह एक भव्य मंदिर खड़ा हो गया।
अब हर मंगलवार और शनिवार वहां श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगती थी। दूर-दूर से लोग मन्नतें लेकर आते, पत्थर पर सिंदूर चढ़ाते और दानपेटी में अपनी श्रद्धा अर्पित करते। उस छोटे-से पत्थर के बारे में अब कई कथाएं प्रचलित थीं। कोई उसे स्वयंभू देवी कहता तो कोई उसके चमत्कारों की नई-नई कहानियां सुनाता।
कई वर्षों बाद वही औरत उस रास्ते से गुजरी। अचानक मंदिर देखकर उसके कदम रुक गए। वह कुछ देर तक उसे देखती रही। फिर उसकी नजर मंदिर के भीतर स्थापित उसी पत्थर पर पड़ी। उसने उसे तुरंत पहचान लिया।
उसने पास खड़े एक श्रद्धालु से पूछा, “यह मंदिर कब बना?”
आदमी ने श्रद्धा से सिर झुकाते हुए कहा, “बहुत पुराना है। कहते हैं, एक दिन माता स्वयं यहां प्रकट हुई थीं। तभी से यह जगह पवित्र मानी जाती है।”
औरत ने उसकी बात सुनी। कुछ कहना चाहा, लेकिन चुप रह गई। उसने अपने हाथ में पकड़ी वही पुरानी सिंदूर की खाली डिबिया देखी और हल्के से मुस्कुराई।
फिर वह आगे बढ़ना चाही, लेकिन बढ़ नहीं पाई। रास्ता बंद था। जिस रास्ते से वह वर्षों पहले गुजरी थी, उसी रास्ते पर अब मंदिर खड़ा था।
वह कुछ क्षण मंदिर को देखती रही और फिर लौट गई।
घंटियाँ बदस्तूर बजती रहीं। मंदिर रास्ता निगलकर गर्व से खड़ा था।








