एक बार चोर तिजोरीलाल अपने प्रतिष्ठित रात्रिकालीन कार्य पर निकला। उसका निशाना था—सेठ सुखविंदर का घर। पूरी पड़ताल के बाद उसे यह विश्वास हो चुका था कि सेठ अपने परिवार सहित कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ है।
तिजोरीलाल ने पूरे इत्मीनान से अपना काम अंजाम दिया। ताले खुले, अलमारियाँ टटोली गईं, तिजोरियाँ हल्की हुईं। इस श्रमसाध्य प्रक्रिया में उसे लगभग तीन घंटे लगे। संतुष्ट मन से वह अपनी बरसों की साधना का फल समेटे घर लौटा।
लेकिन घर पहुँचते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसके अपने घर का ताला टूटा हुआ था। भीतर जाकर देखा तो उसकी बरसों की कमाई पर कोई और हाथ साफ कर चुका था।
चोर के घर चोरी!
यह तो सरासर नाइंसाफी थी।
क्षणभर के लिए उसके मन में पुलिस को फ़ोन करने का विचार आया, मगर उसने तुरंत उसे दबा दिया। पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के लिए चोरी गए सामानों की सूची देनी पड़ती, और सूची देते ही उसकी अपनी प्रतिष्ठा, व्यवसाय और स्वतंत्रता—तीनों संकट में पड़ जाते।
काफ़ी विचार-विमर्श के बाद उसने सबसे सुरक्षित और लोकतांत्रिक रास्ता चुना।
उसने इस गंभीर घटना की सूचना चोर एसोसिएशन को दे दी।
एसोसिएशन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक गोपनीय जाँच समिति गठित कर दी। संयोग से समिति के अध्यक्ष वही सम्मानित सदस्य बनाए गए, जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया था। निष्पक्षता की मिसाल कायम करते हुए उन्होंने स्वयं ही अपनी अध्यक्षता में जाँच शुरू कर दी।
सुनने में आया है कि जाँच तेज़ी से आगे बढ़ रही है।




