जज: तुम्हारे ऊपर आरोप है कि जिस व्यक्ति की सुपारी तुम्हें दी
गई थी, उसकी जगह तुमने किसी और की हत्या कर दी।
क्या तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो?
आरोपी: हुज़ूर, हत्या तो मैंने की
है, लेकिन गलत आदमी की नहीं... गलत पता बताने
वालों की वजह से गलत आदमी मर गया। चार्जशीट में दर्ज है कि मैं लाईसेंसी हत्यारा हूँ - मैं यह गलती कर ही नहीं सकता
जज: विस्तार से बताओ।
आरोपी: हुज़ूर, मुझे हिदायत दी गई
थी—"अगली गली में जिस घर के आगे भैंस बैठी
मिले, उसी घर के मालिक को मार देना।"
जज: फिर?
आरोपी: जब मैं वहाँ पहुँचा, भैंस दूसरे घर के सामने बैठी थी। मैंने समझा कि वही लक्ष्य
है। आखिर मैं सुपारी किलर हूँ, सर्वेक्षक नहीं।
सरकारी वकील: यानी गलत हत्या की वजह भैंस बनी?
आरोपी: जी हुज़ूर, अगर भैंस अपनी
निर्धारित जगह पर बैठी रहती, तो यह दुर्घटना
कभी नहीं होती।
(कुछ देर अदालत में सन्नाटा छा जाता है।)
जज (फैसला सुनाते हुए):
अदालत ने समस्त
तथ्यों, परिस्थितियों तथा भैंस की संदिग्ध
गतिविधियों पर गंभीरता से विचार किया।
प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि
हत्या की वास्तविक प्रेरक, सहायक एवं परिस्थितिजन्य अभियुक्त उक्त
भैंस है।
अतः—
- वर्तमान मुकदमा तत्काल प्रभाव से
खारिज किया जाता है।
- पुलिस भैंस के विरुद्ध भारतीय न्याय
संहिता की उपयुक्त धाराओं में एफआईआर दर्ज करे।
- आवश्यकता पड़ने पर भैंस का नार्को
टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट तथा डीएनए परीक्षण
भी कराया जाए।
- यदि भैंस जमानत का आवेदन दे, तो उसका कड़ा विरोध किया जाए, क्योंकि उसके फरार होकर किसी अन्य
घर के सामने बैठ जाने की प्रबल आशंका है।
जज (हथौड़ा बजाते हुए):
"असली अपराधी चाहे
जितना शक्तिशाली हो, कानून के हाथ... भैंस तक भी पहुँच सकते
हैं।"
अदालत स्थगित।







