Showing posts with label लघुकथा. Show all posts
Showing posts with label लघुकथा. Show all posts

Wednesday, July 29, 2026

भैंस का नार्को टेस्ट

 

जज: तुम्हारे ऊपर आरोप है कि जिस व्यक्ति की सुपारी तुम्हें दी गई थी, उसकी जगह तुमने किसी और की हत्या कर दी। क्या तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो?

आरोपी: हुज़ूर, हत्या तो मैंने की है, पर यह गलती मेरी नहीं है ... गलत पता बताने वालों की वजह से गलत आदमी मर गया। चार्जशीट में दर्ज है कि मैं लाईसेंसी हत्यारा हूँ - मैं यह गलती कर ही नहीं सकता

जज: विस्तार से बताओ।

आरोपी: हुज़ूर, मुझे हिदायत दी गई थी—"अगली गली में जिस घर के आगे भैंस बैठी मिले, उसी घर के मालिक को मार देना। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि भैंस का रंग काला बताया गया था"

जज: ठीक है ... ठीक है, सारी भैंसे काली होती है यह बताओ को फिर क्या हुआ?

आरोपी: जब मैं वहाँ पहुँचा, भैंस दूसरे घर के सामने बैठी थी। मैंने समझा कि वही लक्ष्य है। आखिर मैं सुपारी किलर हूँ, सर्वेक्षक नहीं।

सरकारी वकील: यानी गलत हत्या की वजह भैंस बनी?

आरोपी: जी हुज़ूर, अगर भैंस अपनी निर्धारित जगह पर बैठी रहती, तो यह दुर्घटना कभी नहीं होती।

(कुछ देर अदालत में सन्नाटा छा जाता है।)

जज (फैसला सुनाते हुए):
अदालत ने समस्त तथ्यों, परिस्थितियों तथा भैंस की संदिग्ध गतिविधियों पर गंभीरता से विचार किया।

प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि हत्या की वास्तविक प्रेरक, सहायक एवं परिस्थितिजन्य अभियुक्त उक्त भैंस है।

अतः

  1. वर्तमान मुकदमा तत्काल प्रभाव से खारिज किया जाता है।
  2. पुलिस भैंस के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की उपयुक्त धाराओं में एफआईआर दर्ज करे।
  3. आवश्यकता पड़ने पर भैंस का नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट तथा डीएनए परीक्षण भी कराया जाए।
  4. यदि भैंस जमानत का आवेदन दे, तो उसका कड़ा विरोध किया जाए, क्योंकि उसके फरार होकर किसी अन्य घर के सामने बैठ जाने की प्रबल आशंका है।

जज (हथौड़ा बजाते हुए):
"असली अपराधी चाहे जितना शक्तिशाली हो, कानून के हाथ... भैंस तक भी पहुँच सकते हैं।"

अदालत स्थगित।

Sunday, July 5, 2026

जांच समिति का झुनझुना (लघुकथा)

एक राजा ने एक भव्य इमारत बनवाने का निर्णय लिया। विज्ञापन निकले। नामी निर्माणकर्ताओं ने आवेदन किया, पर ठेका कुछ मशहूर चोरों को मिला। निर्णय स्वयं राजा ने लिया।

राजा ने चोरों को अलग बुलाकर कहा
मैं जानता हूँ तुम चोर हो। इसलिए ही चुना है। इमारत ऐसी बननी चाहिए कि लोग उसकी तारीफ करें, और साथ ही चोरी का पूरा इंतज़ाम भी रहे। चोरी तुम करोगे, और उसका बड़ा हिस्सा मेरे निजी ख़ज़ाने में जाएगा।

चोर मुस्कुरा दिए।

कुछ ही दिनों में इमारत बन गईमज़बूत, भव्य, सुरक्षित। भीतर एक गुप्त मार्ग भी था, जिसे केवल चोर जानते थे।

रातें चोरी में बदल गईं। समझौते के अनुसार हिस्सा बंटता रहाऊपर राजा, नीचे चोर। व्यवस्था सफलथी।

फिर एक दिन गुप्त मार्ग खुल गया।

जनता भड़क उठी। सड़कों पर भीड़ उतर आईन्याय, जाँच और दंड की माँग।

राजा मुस्कुराया और बोला
मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ। शायद आपको पता नहीं कि इसके लिए मैंने एक जांच समिति बना दी है। जो चोर हैं, उन्हें दंड मिलेगा। और तब तक एक नई इमारत बनाई जाएगीपहले से अधिक भव्य, पहले से अधिक सुरक्षित।

भीड़ एक क्षण को मौन रहीफिर ताली बजाई।
कुछ ही देर में मैदान महाराज की जयसे गूंज उठा।

बहुमत का विरोध समाप्त हो गया, पर कुछ हाथों में उठी तख्तियाँ अब भी स्वीकृति में नहीं झुकी थीं।

और इधर, चोरों ने नई इमारत का नक्शा खोल लिया था
इस बार गुप्त मार्ग पहले से भी अधिक चौड़ा था।

Sunday, July 1, 2012

और दर्पण टूटने से बच गया … (लघुकथा)



वह दर्पण के सामने खड़ी हो गयी और बोली, “बता दर्पण ! मेरी ख़ूबसूरती के बारे में बता'”
दर्पण ने उसे निहारा और बोला, “आपसे भी खूबसूरत लोग हैं इस नगर में"
उसे गहन संताप हुआ और उसने क्रोधित होकर एक पत्थर उठा लिया और बोली, “बता दर्पण ! अब तूं मेरी ख़ूबसूरती के बारे में बता'”
दर्पण ने पत्थर देख लिया था, जोर से कहा, “आप बहुत खूबसूरत हैं" फिर धीरे से बोला “पर आपसे भी खूबसूरत लोग हैं इस नगर में"
वह प्रथम वाक्य सुनकर इतना विह्वल हुई की द्वितीय वाक्य को सुनी ही नही. और बेचारा दर्पण झूठ बोलने और टूटने से बच गया.




Wednesday, November 3, 2010

अंकल ! एक दर्जन अंडे दे दीजिये ~~


मंगतू की माँ ने उससे अंडे लाने को कहा. वह दुकान पर गया और दुकानदार से अंडे क्रय के सन्दर्भ में जो वार्ता हुई वह आप भी पढ़िये :

मंगतू : अंकल क्या आपके यहाँ अंडे हैं?

दुकानदार : हाँ हैं.

मंगतू : क्या रेट हैं?

दुकानदार : 24 रूपये दर्जन

मंगतू : अंकल ! एक दर्जन अंडे दे दीजिये.

दुकानदार : बेटे ! यहाँ आकर खुद ही अंडे गिनकर ले लो. दरअसल मैं अंडों को हाथ नहीं लगाता.

इस बात पर मंगतू हैरान-परेशान सोचने लगा आखिर अंकल अंडे बेचते हैं तो छूते क्यों नहीं हैं !!!!!!!!!!

Friday, October 29, 2010

ईलाज ठीक चल रहा है ~~

मंगतू बीमार हो गया. आनन-फानन में उसे अस्पताल पहुँचाया गया. अस्पताल में अब उसके स्वास्थ्य में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है.  जब डाँक्टर से उसके बीमारी के बारे में पूछा गया तो डाँक्टर ने बताया कि :

'मंगतू के शरीर के आंतरिक अवयव मिलावटी भोज्य पदार्थ को ग्रहण करने और पचाने के आदी हो चुके हैं. शायद उसने किसी दिन विशुद्ध भोजन कर लिया होगा और बीमार हो गया.'

यह पूछने पर कि अस्पताल में आकर इतनी जल्दी कैसे ठीक हो गया तो डाँक़्टर ने जो बताया वह कम चौकाने वाला नहीं है :

'हमने यहाँ पर उसे एक नकली और मिलावटी इंजेकशन  लगा दिया और उसके भोजन को मिलावटी बना दिया गया है साथ ही प्रदूषित आक्सीजन का मास्क भी लगाया गया है.'

मुझे लगा ईलाज ठीक चल रहा है.

Saturday, June 12, 2010

नेपथ्य में ~ नेपथ्य से बाहर (लघुकथा)

image

नेपथ्य में :

माता के जागरण के लिये कुल चन्दे से आयी रकम : 23900 रूपये

माता के जागरण पर कुल खर्च : 8600 रूपये

बचत (लाभ) : 15300 रूपये

आयोजक नशे में धुत्त, संख्या में कुल तीन. तीनों ने अपने हिस्से का 5100 रूपये लिया और अपना-अपना जाम उठा लिया. 

नेपत्थ्य से बाहर :

जागरण चरमोत्कर्ष पर. माँ का गुणगान जारी :

माता तेरी लीला अपरम्पार

मेरा भी कर दे बेड़ा पार ... 

Thursday, April 29, 2010

और वे सत्संग में चली गयी ---- लघुकथा

वे बेचैनी से कमरे में टहल रहीं थी. अभी तक फोन क्यों नहीं आया? पता नहीं प्रबन्ध हुआ कि नहीं. "बेटा दो साल से फेल हो रहा है. चिंता हो किसी को तब न ! अबकी तो कुछ भी करके पास करवाना ही होगा."

ट्रिंग -- ट्रिंग

"हलो, क्या हुआ?"

"हो गया?"

"अच्छा ! कैसे?"

"स्कूल के चपरासी से और स्कूल के अध्यापक से बात हो गयी है. किताबे पहुँच जायेंगी. चिंता मत करो."

"अरे वाह ! ये तो बहुत अच्छा हुआ, मैं तो चिंता से घुली जा रही थी. भगवान भला ही करता है. अब चिंता दूर हुई. अब निश्चिंत होकर सत्संग में जा पाऊँगी."

------ और वे सत्संग में चली गयी.

Tuesday, August 25, 2009

मंजिल की तलाश ~~



वह मंजिल की ऑर बढ़ा जा रहा था। उसे उसके गंतव्य की खुशबू भी आने लगी थी। मन में हुलास लिए वह गुनगुनाते हुए आगे बढ़ रहा था। कितना उमंग था उसे अपनों से मिलने का ! -- पहुँचने से पहले वह थोड़ा सुस्ता लेना चाहता था। पथ की थकन को शांत करने के निमित्त पल भर को एक चौराहे पर रूका। मुँह-हाथ धोकर आगे बढ़ने से पहले एहतिहातन उसने एक पथिक से रास्ता पूछ लिया। उसने उसे रास्ता बताया। उसने उसका धन्यवाद किया और ---
---- उसके बताये रास्ते पर चल पड़ा। --------
और फ़िर वह आज तक रास्तों पर भटक रहा है।
वह आज भी अपनी मंजिल तलाश रहा है।
-------- मंजिल तलाश रहा है।

विश्व रेडक्रास दिवस

विश्व रेडक्रास दिवस
विश्व रेडक्रास दिवस पर कविता पाठ 7 मई 2010

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ
हिन्दी दिवस 2009

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

ब्लागोदय


CG Blog

एग्रीगेटर्स

ब्लागर परिवार

Blog parivaar