चित्र पर क्लिक करके पढ़े :
Sunday, May 23, 2010
Friday, April 16, 2010
वह किरंच आज भी मुझे चुभ रहा है -------
उस दिन बैठी थी तुम यही ... थोड़ा सा फासला था हमारे और तुम्हारे बीच. मैं न जाने कब से उस फासले को कम करने की कोशिश कर रहा था. पहाड़ सा यह फासला ... टूटता हुआ प्रतिपल हौसला मेरा. घास की हरीतिमा के बीच रह रह कर चहकती हुई तुम .... पेड़ के गिरते पत्ते सा मैं तुम्हारी मासूमियत को स्पर्श कर लेने को उतावला या फिर बावला. अनगिन सम्वादों के बीच सम्वादहीन हमारे अस्तित्व. सब कुछ तो कहा था तुमने, पर वो नहीं जो सुनने के लिये मेरे कर्ण आतुर थे. शायद तुमने देखा ही नहीं था उस परिन्दे को जिसकी उड़ान नीले आसमान की छत्रछाया में बदस्तूर जारी थी. मैं आबद्ध था तुम्हारे तिलिस्म में. याद है मुझे आज भी, किस कदर तुम समेट लेती थी उस पेड़ के गिरते पत्तों को जिसके नीचे हम बैठे थे. मैं इंतजार करता रहा शायद तुम्हें मेरी भावनाओ की आहट मिले और शायद तुम इन्हें भी समेटने की कोशिश करो. पर नही ....
वक्त भी नासमझ सा व्यवहार करता है जब बीतना होता है तो बीतता ही नहीं और जब ठहरने की आवश्यकता होती है तो भागने की तैयारी कर लेता है. तुम्हें शायद ढलती शाम का इलहाम हो गया था. अचानक ही तो तुम उठी थी, जाने के लिये. शायद यह मेरे लिये अप्रत्याशित था --- शायद यह मेरे लिये ------- और फिर अनायास बिना किसी मंसा के मैनें तुम्हारा हाथ थाम ही तो लिया था. और फिर दर्द से तुम छटपटा उठी थी. पता नहीं कौन सा दर्द ज्यादा भारी था , मेरे अप्रत्याशित व्यवहार का दर्द या हाथ थामने से तुम्हारी कलाई पर इन्द्रधनुष रचते चूडियों में से एक चूड़ी टूटने और कलाई में चुभ जाने का दर्द. रक्त की बूँद चुहचुहा आयी थी तुम्हारी कलाई पर --- मुझे पता है तुमने न जाने कैसे समेट लिया था बरसने को आतुर बादलों को पलकों के आँचल में. और तुम चली गयी थी मुझे वहीं छोड़कर ---
मैं जानता हूँ वह चूड़ी का वह किरंच बहुत छोटा था. इतना भी नहीं था कि उसके दिये जख्म को सहा न जा सके तभी तो क्षणांश मे ही तुमने स्वयं को सहज कर लिया था. तुम चली गयी ---- शायद तुम्हारी कलाई पर चुभन के निशान वक्त के मरहम ने मिटा दिया होगा, पर वह किरंच आज भी मुझे चुभ रहा है -------
Saturday, August 1, 2009
एक रिसर्च : कुत्तों पर
बहुत समय खर्च किया है
कुत्तों पर बहुत गहराई से
रिसर्च किया है.
मैं भी परम्परा निभाया है
सबसे पहले
इनके नस्ल के बारे में बताऊंगा
जो लोग सतही तौर पर देखते हैं
वे इनकी सैकड़ों नस्लें बताते हैं
मैं अपने रिसर्च के दौरान
छान आया हूँ पूरा जग
अब तो पहचानने लगा हूँ मै
इन कुत्तों की रग-रग
बेशरम हड्डी खाकर
कभी मुँह नहीं धोता है.
मेरा खोज बतलाता है
कुत्तों का केवल
दो नस्ल होता है.
एक जन्मजात कुत्तों की
तो दूसरी नस्ल है
कुत्तों के गुणों (!!) को
आत्मसात किये कुत्तों की.
पहला तो फिर भी
कम खतरनाक होता है
दूसरे का काटा तो
जीवन भर रोता है.
सीधा सा तर्क है
कुत्ते और गधे में
बहुत फर्क है
कोई कुत्ता
गधा नहीं बनना चाहता है
पर कुछ गधे
कुत्ते ज़रूर बन जाते हैं
एक बार इनकी सभा में
बाइज्जत मैं भी शरीक हुआ
मैने देखा कि
अपनी सभा में भी ये खुद को
बहुत कम सामने लाते हैं
मंच पर तो ये
गधों को ही बिठाते हैं
सामने की सीट पर
ये खुद बैठ जाते हैं
पिछली सीट पर
कुछ दुम दबाऊ तो कुछ
टांग उठाऊ कुत्ते बैठ जाते हैं
अगली पंक्ति में मंच के सामने
बड़े कुत्ते विराजमान होते हैं
कभी ये मेहमान तो
कभी ये मेज़बान होते हैं
सबसे खतरनाक कुत्ता
सबको चुप कराकर
माईक हाथ में ले लेता है
और बेशरम
इंसानों पर किये रिसर्च का
ब्यौरा देता है
इनकी भौंक सुनकर
सिर में दर्द होने लगा
अब बाम लूंगा
इन्हीं शब्दों के साथ
अब मैं विराम लूंगा
धन्यवाद
हिन्दी दिवस : काव्य पाठ
हिन्दी दिवस 2009
राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

