Sunday, August 9, 2026

भारत विकसित राष्ट्र है — संदेह करना राष्ट्र का अपमान है!

 

कुछ लोग पूछते फिर रहे हैं कि भारत विकसित राष्ट्र है या नहीं। ऐसे लोगों पर मुझे दया आती है। ये बेचारे विकास को पहचानते ही नहीं। इन्हें लगता है कि विकास का मतलब कारखानेरोजगारशिक्षास्वास्थ्य और नागरिकों का जीवन स्तर होता है। ये लोग बहुत पुरानी किताबें पढ़ते हैं।

आज विकास की परिभाषा बदल चुकी है।

सरकार यदि दिन में दस बार विज्ञापन देकर बता रही है कि विकास हो रहा हैतो फिर विकास हो ही रहा है। आखिर विज्ञापन झूठ बोलने के लिए थोड़े ही बनाए जाते हैं! अगर टीवी पर नदी साफ़ दिख रही हैतो नदी साफ़ ही होगी। जो गंदगी देख रहे हैंउन्हें शायद अपना चश्मा बदल लेना चाहिए।

औद्योगिक विकास भी खूब हुआ है। पहले लोग सिर्फ़ सामान बनाते थे। अब अवसर बनाए जाते हैं। पेपर लीक एक बड़ा उद्योग है। रिश्वत उद्योग तो इतना विकसित हो चुका है कि बिना किसी सरकारी संरक्षण के पूरे देश में फल-फूल रहा है। दलालीकमीशनफर्जीवाड़ा और चढ़ावा-प्रबंधनये सब आत्मनिर्भर भारत के सफल मॉडल हैं। इन उद्योगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें कभी मंदी नहीं आती।

अर्थव्यवस्था का हाल भी शानदार है। कुछ लोग कहते हैं कि रुपया डॉलर के सामने कमजोर हो रहा है। कितनी नासमझी की बात है! रुपया कमजोर नहींविनम्र हो रहा है। दुनिया को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश देने वाला देश अपनी मुद्रा को भी अहंकारी कैसे होने देगा?

और नेताओं की संपत्ति को देखिए। चुनाव के समय जो संपत्ति शपथपत्र में होती हैपाँच साल बाद वह कई गुना हो जाती है। इससे बड़ा आर्थिक विकास और क्या होगाअगर एक जनप्रतिनिधि अपनी निजी अर्थव्यवस्था को इतनी तेजी से विकसित कर सकता हैतो मान लेना चाहिए कि देश सही हाथों में है। विकास पहले प्रतिनिधि तक पहुँचता हैफिर धीरे-धीरे जनता तक आने की तैयारी करता है। जनता को धैर्य रखना चाहिएविकास भी आखिर वीआईपी है।

अब भी यदि किसी को भारत के विकसित राष्ट्र होने पर संदेह हैतो दोष भारत का नहींउसकी आँखों का है। उसे विकास कम और वास्तविकता ज़्यादा दिखाई देती है। ऐसी दृष्टि लोकतंत्र में बहुत कष्ट देती है।

मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा जब हम विकास की परिभाषा ही बदल देंगे। फिर कोई विवाद नहीं रहेगा। क्योंकि जिस देश में परिभाषाएँ बदलने की शक्ति होउसे विकसित राष्ट्र बनने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

10 comments:

Digvijay Agrawal said...

 आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में  गुरुवार 13 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

M VERMA said...

शुक्रिया

सुशील कुमार जोशी said...

सटीक

M VERMA said...

शुक्रिया

Razia Kazmi said...

पूरी तरह विकास की परिभाषा समझा दिया है

Sudha Devrani said...

चुनाव के समय जो संपत्ति शपथपत्र में होती है, पाँच साल बाद वह कई गुना हो जाती है। इससे बड़ा आर्थिक विकास और क्या होगा? अगर एक जनप्रतिनिधि अपनी निजी अर्थव्यवस्था को इतनी तेजी से विकसित कर सकता है, तो मान लेना चाहिए कि देश सही हाथों में है। विकास पहले प्रतिनिधि तक पहुँचता है, फिर धीरे-धीरे जनता तक आने की तैयारी करता है। जनता को धैर्य रखना चाहिए; विकास भी आखिर वीआईपी है।
वाह!!!
क्या बात...
लाजवाब ।

M VERMA said...

जी शुक्रिया

M VERMA said...

शुक्रिया 😃

हरीश कुमार said...

सुन्दर लेख

M VERMA said...

Thanks 😊

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