Wednesday, January 14, 2026

रातों-रात ऐतिहासिक विधेयक पास

1.    जिस तरह परिवहन विभाग वाहन में ज़रा-सी अनियमितता पर चालान ठोक देता है, उसी तरह अब वाहन मालिक भी सड़क की बदहाली पर सरकार का चालान काट सकेंगेगड्ढा गहरा होगा तो जुर्माना दोगुना।

2.   जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी चुनावी सभाओं में शामिल नहीं हो सकते, उसी प्रकार अब मंत्री भी चुनाव प्रचार से वंचित रहेंगे, क्योंकि जनता ने उन्हें पोस्टर चिपकाने के लिए नहीं, काम करने के लिए चुना है।

3.   सरकारी वाहन का प्रयोग अब केवल सरकारी कार्यों के लिए होगा

सब्ज़ी, तरकारी, दूध, और रिश्तेदारों की बारात ढोने के लिए नहीं।


4.   शिलान्यास पट्टिकाओं की संख्या कार्य की गुणवत्ता से जोड़ी जाएगी

काम न हुआ तो पट्टिका भी नहीं,और दोबारा फीता काटने पर फीता काटने वाले का वेतन कटेगा।


5.   हर वादे के साथ डिलीवरी डेट अनिवार्य होगी

तारीख़ निकलने पर वादा अपने आप जुमलाघोषित मान लिया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार यह विधेयक जनता के सपनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ है। जागने पर इसके लागू होने की संभावना न के बराबर ज्यों-की-त्यों बनी हुई है।

शेष अगले अंक में क्रमश:

Saturday, November 1, 2025

सैलाब रक्खेंगे ....


ये तुम्हारा भरम है कि वे गुलाब रक्खेंगे
मंजिल से ठीक पहले वे सैलाब रक्खेंगे

हकीकत कही तुमसे रूबरू न हो जाये
तुम्हारे पलको पर अब वे ख्वाब रक्खेंगे
  
औंधे पडे मिलेंगे तुम्हारे सवालो  के तेवर
चाशनी से लिपटे जब वे जवाब रक्खेंगे

रख दो अपनी खिलाफत ताक पर तुम
खिदमत में वे कबाब और शराब रक्खेंगे
  
उनकी मासूमियत पर यकीन कर लेंगे
जब वे अपनी नज़रो में तालाब रक्खेंगे

लाजिमी है इस चमन का यू ही मुरझाना
जब इनकी जडो में आप तेजाब रक्खेंगे

इनकी नज़रो के आंसू भी थम जायेंगे
गर आप भी अपनी आंखो मे आब रखेंगे

Sunday, July 1, 2012

और दर्पण टूटने से बच गया … (लघुकथा)



वह दर्पण के सामने खड़ी हो गयी और बोली, “बता दर्पण ! मेरी ख़ूबसूरती के बारे में बता'”
दर्पण ने उसे निहारा और बोला, “आपसे भी खूबसूरत लोग हैं इस नगर में"
उसे गहन संताप हुआ और उसने क्रोधित होकर एक पत्थर उठा लिया और बोली, “बता दर्पण ! अब तूं मेरी ख़ूबसूरती के बारे में बता'”
दर्पण ने पत्थर देख लिया था, जोर से कहा, “आप बहुत खूबसूरत हैं" फिर धीरे से बोला “पर आपसे भी खूबसूरत लोग हैं इस नगर में"
वह प्रथम वाक्य सुनकर इतना विह्वल हुई की द्वितीय वाक्य को सुनी ही नही. और बेचारा दर्पण झूठ बोलने और टूटने से बच गया.




Monday, May 21, 2012

पीकर बेचारा किसी नाले में पड़ा होगा ….



शाम हो चुकी है भला कैसे खड़ा होगा
पीकर बेचारा किसी नाले में पड़ा होगा
.
उसकी मुस्कुराहट कर रही है चुगली
शादीशुदा नहीं शर्तियाँ वह 'छड़ा' होगा
.
आज फिर उसका चेहरा सूजा हुआ है
किसी ‘नाजनीन’ ने थप्पड़ जड़ा होगा
.
नाक कट गयी है, आँख कहीं और होगा
किसी बिजली के खम्भे से लड़ा होगा
.
‘तौहीन’ इसके लिए शान -ओ-शौकत है
इसके जेहन में शायद चिकना घड़ा होगा

Sunday, May 13, 2012

जो नंगा है , वही चंगा है .....


(वैधानिक चेतावनी : यहाँ शारीरिक नंगई को कोई स्थान नहीं है)
नंगा होने का सुख नंगा ही जान पायेगा. वस्तुत: नंगई एक नैसर्गिक गुण है जो अर्जित भी की जा सकती है और विरासत में भी मिल सकती है. नंगई के लिए आवश्यक संसाधन है माँ-बहन की गालियाँ. यह भी साधना से अर्जित की जाती है. वैसे भी आजकल के सीरियलों और तथाकथित ‘रियलिटी शोज’ में यह बखूबी प्रयोग की जाती है और वहाँ से भी अर्जित की जा सकती है.
समाज के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें यह अतिआवश्यक गुण की श्रेणी में आते हैं, उनमें से कुछ प्रमुख हैं : राजनीति, ठेकेदारी, भाईगिरी, उठाईगिरी आदि. प्रथम दो क्षेत्रों (राजनीति, ठेकेदारी) में यह थोड़े परिमार्जित रूप में परिलक्षित होती है पर अन्य दो क्षेत्रों (भाईगिरी, उठाईगिरी) में यह अपने नैसर्गिक रूप में ही कारगर है.
यहाँ बाथरूम या हरम में नंगे को नंगई के रूप में नहीं देख सकते. क्योंकि ऐसा करने से शायद ही कोई नंगई के इलज़ाम से बच पाये. यहाँ की चर्चा में केवल सार्वजनिक रूप से नंगे ही शामिल हैं. सार्वजनिक नंगई में लिप्त आमतौर पर वैयक्तिक नंगई से परे भी होते हैं.
नंगई को साध चुके समाज के हर क्षेत्र में अपने कार्य संपादन में इसका चतुराई से प्रयोग करते हैं. कई तो नंगई से अपने कार्य को संपन्न करवाने के उपरांत नंगई के खिलाफ प्रवचन देते दिख सकते हैं, जैसा आमतौर पर राजनीति में देखा जा सकता है.
नंगई का असली स्वरूप इस उदाहरण से स्पष्ट हो सकता है :
दृश्य : परीक्षास्थल (काल्पनिक)
आब्जरवर ने सामूहिक नकल पकड़ लिया और सेंटर के खिलाफ पत्र तैयार कर ही रहा है कि तभी एक लड़की (प्रायोजित) आब्जरवर के खिलाफ नक़ल चेकिंग के दौरान अनावश्यक रूप से स्पर्श, यानी छेडछाड का आरोप लगाने वाला पत्र लेकर आ गयी’
निष्कर्ष : आब्जरवर भी वही है, कोई शिकायत भी नहीं हुई, सभी सानन्द हैं और नक़ल जारी है.
मेरे एक मित्र का पुत्र (मात्र ४ वर्षीय) नैसर्गिक रूप से अर्जित किये हुए गुण का बखूबी प्रदर्शन किया. जब वे बाजार में थे तो उनका पुत्र एक खिलौने की जिद कर बैठा और मना करने पर वहीं नंगा हो गया. मजबूरन वह खिलौना उन्हें खरीदना ही पड़ा.
अस्तु, ये उदाहरण साबित करने को पर्याप्त हैं कि नंगई एक सात्विक ही नहीं कारगर गुण है.
कहना ही पडेगा “जो नंगा है,  वही चंगा है”

Monday, April 30, 2012

तुम्हारी आशिकी शक के दायरे में है …


पीये और पिलाए नहीं तो क्या किया?
पीकर भी जो लड़खडाए नहीं, तो क्या किया?
.
तुम्हारी आशिकी शक के दायरे में है
नाज़नीन से पिटकर आये नहीं, तो क्या किया?
.
शादीशुदा के लिए तो तोहफा है बेलन
बीबी से आजतक खाए नहीं, तो क्या किया?
.
सियासत का दंभ भरते हो, कच्चे हो पर
घोटालों के लिस्ट में आये नहीं, तो क्या किया?
.
माना उठ गयी थी महफ़िल जहां गए थे
और किसी बारात में खाए नहीं, तो क्या किया?
.
कोई और क्यों न उठा लेगा अमानत
बुलाने पर भी तुम आये नहीं, तो क्या किया?
.
माशूका मिली किसी और के पहलू में
फिर भी तुम तिलमिलाए नहीं, तो क्या किया?
.
माना कि तुमने स्वर साधना नहीं किया
बाथरूम में भी जो गाये नहीं, तो क्या किया?
.
नफ़रत है तुम्हें नहाने से जगजाहिर है
शादी के दिन भी नहाये नहीं, तो क्या किया?

Friday, April 6, 2012

आजकल वे मुझसे नाराज़ हैं …


आजकल वे मुझसे नाराज़ हैं. यूँ तो मैं कभी नाराज़ नहीं होता और न किसी की नाराजगी का अंदाज़ा होता है. पर पत्नी के मामले में बात अलग है. वे जब भी मुझे उलाहनों से वंचित रखती हैं मैं समझ लेता हूँ कि नाराज़ हैं. नाराजगी का कोई कारण हो जरूरी नहीं है. गर्मी ज्यादा हो तो वे मुझपर नाराज़ हो सकती हैं. बेटा न पढ़े तो, और पढने बैठा रहे तो वे नाराज़ हो सकती हैं. विद्यालय से मैं जल्दी आ जाऊ तो; देर से आऊँ तो; भूख न लगने पर न खा पाऊँ तो; भूख लगने पर ज्यादा खा लूं तो वे नाराज़ हो सकती हैं.

एक बार मैंने उनके माथे पर लगे सूक्ष्म बिंदी पर ध्यान नहीं दिया तो माथे पर बल पड़ गया था. वैसे बिंदी पर ध्यान न देने को मैं अपनी गलती मानता हूँ. बहुत समझाया कि बिंदी छोटी होने के कारण निगाह में नहीं आ पाई वरना मैं तो बिंदियों पर बहुत ध्यान देता हूँ. बस फिर नया मसला खड़ा हो गया. ‘किस-किस की बिंदियों पर ध्यान देते हो.’ तौबा- तौबा बिना बिंदी के काम नहीं चल सकता क्या?

एक बार उनके ही आदेश पर टेबुल पर चढ़कर जाले साफ़ कर रहा था और अचानक पता नहीं कैसे टेबुल से फिसल कर गिर गया. टांग टूट गयी, प्लास्टर लगने के बाद पहली उलाहना यही थी कि जरूर तुम टेबल पर चढ़कर पड़ोसी के घर में झांक रहे होगे, तभी ध्यान बंटा होगा और गिर गए होगे.

सार्वभौमिक है यह समस्या. मैं स्वीकार कर रहा हूँ तो आप मुझ पर हँस रहे होंगे या सहानुभूति की टिप्पणियाँ तैयार कर रहे होंगे. पर गिरेबान में झाँक कर जरूर देख लें. कहीं यह स्थिति आपकी भी तो नहीं है. वैसे पत्नी की नाराजगी से मुझे कोई नाराजगी नहीं है. क्योंकि इस नाराजगी के बाद जो मनाने और फिर अंततोगत्वा उनके मान जाने पर जो सुख मिलता है वह अवर्णनीय है.

फिलहाल तो मैं अब उन्हें मनाने के उपाय सोचने में अपने चिंतन की समस्त क्षमता का उपयोग करूँगा और मना ही लूंगा, इसलिए अब विराम लेता हूँ.

धन्यवाद !

विश्व रेडक्रास दिवस

विश्व रेडक्रास दिवस
विश्व रेडक्रास दिवस पर कविता पाठ 7 मई 2010

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ

हिन्दी दिवस : काव्य पाठ
हिन्दी दिवस 2009

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

राजस्थान पत्रिका में 'यूरेका'

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

ब्लागोदय


CG Blog

एग्रीगेटर्स

ब्लागर परिवार

Blog parivaar