पिछले दिनों मैं दिल्ली से बाहर था. अपने गृहनगर वाराणसी जो गया हुआ था. वाराणसी कहते ही कुछ भारी भरकम सा शहर ज़ेहन में उभरता है, चलो वाराणसी न कहकर 'बनारस' या 'काशी' कह लेते हैं.
कुछ स्मृतियाँ और चित्र सहेजकर लाया हूँ जो क्रमश: बाटूँगा. पर आज मैं एक सख़्श से परिचय करवाना चाहूँगा जो मेरे लिये आदरणीय तो हैं ही मार्गदर्शक भी रहे हैं. उनका नाम है धर्मेन्द्र कुशवाहा. ये रेलवे से सेवानिवृत्त हुए हैं और लेखन से जुड़े हुए हैं. इनकी रचनाएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती है.
ये सर्वथा ब्लागजगत से अछूते थे. मैनें इन्हें ब्लागजगत से परिचय करवाते हुए इनका ब्लाग शुरू करवाया .... 'मुनादी'. इनकी प्रथम पोस्ट 'बासी रोटी' आप भी पढ़े और इन्हें ब्लागजगत में सक्रिय करने में मेरे साथ आप भी अपनी भूमिका निभाएँ (एक आग्रह).
इनके ब्लाग तक पहुँचने के लिए चटका लगायें
धर्मेन्द्र कुशवाहा जी के साथ मैं


