चोर के साथ कोई वकील नहीं था। उसने अपना
मुक़दमा स्वयं लड़ने का निश्चय किया।
वह पहले कटघरे में खड़ा हुआ। फिर बाहर
आकर बचाव पक्ष का वकील बन गया और अपने पक्ष में लंबी-चौड़ी दलीलें देने लगा।
तभी उसकी नज़र अभियोजन पक्ष पर गई। वहाँ
भी कोई नहीं था। वह उधर पहुँचा और सरकारी वकील की भूमिका निभाते हुए अपने ही
विरुद्ध आरोप गिनाने लगा। फिर स्वयं ही उनका जवाब भी देता गया।
बहस समाप्त हुई तो उसने देखा कि
न्यायाधीश की कुर्सी भी खाली है।
वह कुछ क्षण सोचता रहा, फिर उठकर उस कुर्सी पर जा बैठा।
हथौड़ा बजाते हुए बोला—
"वादी, प्रतिवादी,
दोनों पक्षों की दलीलें और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के
बाद यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि अभियुक्त निर्दोष है। अतः इसे
सम्मानपूर्वक बरी किया जाता है।"
फैसला सुनाकर वह मुस्कराया, न्यायाधीश की कुर्सी से उतरा और एक बरीशुदा चोर की तरह अदालत से बाहर चला गया।






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