Thursday, April 8, 2010

संस्कारों का ओर-छोर

अबे पैसे किस बात के हम तो स्टाफ़ हैं

कोई बात नहीं, आप अपना परिचय पत्र दिखा दीजिये.

अच्छा, तेरी ये औकात कि तुम परिचय पत्र मांगेगा.

सर, फिर तो टिकट लेनी ही होगी.

अच्छा, तो तूँ मुझे टिकट देगा. खुद का टिकट कटवाना है क्या?

और फिर कंडक्टर ने बस रोकवाकर उसे उतार दिया और बस चलाने के लिये ड्राईवर को संकेत किया.

उसे यह नागवार लगा और एक पत्थर उठाकर बस पर दे मारा.  पत्थर बस के शीशे पर लगी और शीशा टूटता हुआ खिड़की के पास अपनी सहेली के साथ बैठी लड़की को जा लगा. उसके होठ के पास कट गया था. खून रिसने लगा.

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पास खड़े लड़के ने बस रूकवाई. उस लड़की को नीचे लाने के लिये उसकी सहेली से बोला साथ ही वह भी नीचे आया और खून के रिसाव को रोकने की कोशिश की. यहाँ तक कि उसने अपनी शर्ट भी आफर की पर रूमाल से ही काम चल गया.

उसने आते जाते वाहनों से मदद प्राप्त करने की कोशिश की. कई नज़रअन्दाज़ कर चले गये. एक शरीफ दम्पत्ति ने अपनी कार रोकी और लड़की को अस्पताल तक ले गये. चार टांके लगे. दम्पत्ति ने पैसे आफर की. पर लड़की के पास पर्याप्त पैसे थे अत: उसने उसका धन्यवाद किया और वे चले गये. फिर वे दोनों अपने हास्टल लौट आयीं.

वह लड़की कोई और नहीं मेरी अपनी बेटी ही है जो हास्टल में रहकर बी. टेक. (अंतिम वर्ष) की पढ़ाई कर रही है. उसका हास्टल गाजियाबाद के राज नगर में है और कालेज वहाँ से लगभग 15 किमी दूर है. वह विगत 6 अप्रैल 2010 को अपनी सहेली के साथ आवश्यक कार्यवश गाज़ियाबाद से आनन्द विहार जा रही थी. अब वह घर लौट आयी है और स्वास्थ्य लाभ कर रही है. सोचता हूँ कि एक वह लड़का था और एक यह लड़का. कितना अंतर है दोनों में. शायद यह संस्कारों का ओर-छोर था.

8 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

दुखद वर्मा साहब , इस पश्चिमी उत्तरप्रदेश के तो क्या कहने, यूँ तो पूरा उत्तरप्रदेश ही मुलायम और माया ने स्वर्ग बना दिया है गुंडे मवालियों के लिए ! राह चलती औरत के गले से चेन झपटते है और जब देखते है कि चेन नकली है तो इनकी हिम्मत देखो कि वापस आकर उस महिला को थप्पड़ मार कर कहते है सा.... नकली जेवर पहनती है !

'अदा' said...

यह एक दुखद घटना है वर्मा जी...
आशा है आपकी बेटी सकुशल होगी अब...
और यह बिलकुल सही बात है....यह संस्कारों की ही बात होती है...

rashmi ravija said...

ओह...इस घटना ने तो रोंगटे खड़े कर दिए....वह लड़का तो देवदूत सा आया और उन दंपत्ति ने भी अपनी कार रोक कर समय पर सहायता की...पर बिटिया को तो बेवजह कष्ट झेलना ही पड़ा,ना...आशा है अब सकुशल होगी..
पर पढ़ कर थोड़ी राहत भी मिली...दुनिया खाली नहीं है भले लोगों से और उनके बल पर ही चल रही है...

संजय भास्कर said...

यह एक दुखद घटना है वर्मा जी...

Jyoti said...

दोनों में. शायद यह संस्कारों का ओर-छोर था.................

यह बिलकुल सही बात है....यह संस्कारों की ही बात होती है...

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

दुखद घटना है वर्मा जी मगर एक बात जो आप ने कही शत प्रतिशत सही है ,,, ये संस्कारों का ही फर्क है

सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

kunwarji's said...

क्या "स्टाफ" संस्कारों पर हावी हो जाना चाहिए यदि संस्कार है तो?ये जो एक घटना है वो सिर्फ संस्कारों की ही बात नहीं लगती!ये "स्टाफ" शब्द जब किसी तिपहिये वाहन में गूंजता है,जिसका अधिकतम किराया पाँच रूपये ही है,उसमे भी,तो ये संस्कार कम और औकात की बात ज्यादा दिखाई देती है!बहारहाल घटना दुखद भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी!

लेकिन जब तक हम दुसरो को ऐसी घटना का शिकार होते देखते है तब नहीं जागते!माफ़ी चाहूँगा ये मै आप को नहीं,वरन अपने समेत सभी भारतीयों के लिए कह रहा हूँ! कभी अपने फायदे के लिए,तो कभी अपने नुक्सान से बचने के लिए हम जरुरत के समय नहीं बोलते!



कुंवर जी,

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बात संस्कार कि है ... पारिवारिक संस्कार भी और सामाजिक संस्कार भी ! खैर, आशा है कि अब आपकी बेटी कुशल होगी ! दुःख तो इस बात का है कि ऐसी घटनाएँ अब और आम होती जा रही हैं .... ये चिंता का विषय है .....

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