वह मंजिल की ऑर बढ़ा जा रहा था। उसे उसके गंतव्य की खुशबू भी आने लगी थी। मन में हुलास लिए वह गुनगुनाते हुए आगे बढ़ रहा था। कितना उमंग था उसे अपनों से मिलने का ! -- पहुँचने से पहले वह थोड़ा सुस्ता लेना चाहता था। पथ की थकन को शांत करने के निमित्त पल भर को एक चौराहे पर रूका। मुँह-हाथ धोकर आगे बढ़ने से पहले एहतिहातन उसने एक पथिक से रास्ता पूछ लिया। उसने उसे रास्ता बताया। उसने उसका धन्यवाद किया और ---
---- उसके बताये रास्ते पर चल पड़ा। --------
और फ़िर वह आज तक रास्तों पर भटक रहा है।
वह आज भी अपनी मंजिल तलाश रहा है।
-------- मंजिल तलाश रहा है।
manzil mil kar rahegi..
ReplyDeletetalash jaari rahe to..
shubhkamnaayein..
ya fir manzil kabhi nahi milti
ReplyDeleteshayad ise hi 'Pragati' kahte hain...
बहुत ही सुन्दर .........रचना गहरे भाव लिये हुये........
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर और नए अंदाज़ के साथ आपकी ये रचना बहुत अच्छी लगी ! आपको मंजिल ज़रूर मिलेगी !
ReplyDeleteआदरणीय वर्मा साहब,
ReplyDeleteयहाँ आकर आपके साहित्य की गहराई का पता चलता है कि रास्ता पुछने के बाद मुसाफिर भटकता रह गया।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
laghu katha ke roop mein sateek rachna.... gahre bhaav ke saath........
ReplyDeleteshubhkaamnayen.....
laghu katha ke roop mein sateek rachna.... gahre bhaav ke saath........
ReplyDeleteshubhkaamnayen.....
आप किसी राहगीर से रास्ता मत पूछिएगा रास्ते से तब नही भटकेंगे.
ReplyDeleteverma ji ,
ReplyDeletebahut khoob kaha hai aapne.badhai!!
Mr. Verma, there is a surprise for you on my blog!! :)
ReplyDeleteवो क्या राह दिखायेंगे मुझको जिन्हे खुद अपना पता नही है
ReplyDeleteVerma ji,
ReplyDeletebahut dino se aapne kuch likha nahi hai.
kya baat hai ?
mujhe pahali pahli dua dene wale aap hein DUA CHAHIYE POST PAR to bahut bahut shukria.
ReplyDeletemanzil ki talaash accha tanz hai.
happy dashera.