ये
तुम्हारा भरम है कि वे गुलाब रखेंगे
मंज़िल से ठीक पहले वे सैलाब रखेंगे
हक़ीक़त कहीं तुमसे रूबरू न हो जाए
तुम्हारी पलकों पर अब वे ख़्वाब रखेंगे
रख दोगे अपनी खिलाफ़त ताक पर तुम
जब ख़िदमत की थाली में वे कबाब रखेंगे
तुम्हारा ही ऐलान होगा कि वे मासूम हैं
पानी कहकर गिलासों में शराब रखेंगे
लाज़िमी है इस चमन का यूँ ही मुरझाना
जब इसकी जड़ों में आप तेज़ाब रखेंगे
इनकी नज़रों के आँसू भी थम जाएँगे
गर आप भी अपनी आँखों में आब रखेंगे
‘वर्मा’ के
सभी सवाल औंधे पड़े मिलेंगे
चाशनी से लिपटे जब वे जवाब रखेंगे

आपने आपकी कविता से दिखा दिया कि हर मुस्कान के पीछे इरादे कितने उलझे हो सकते हैं। रिश्ते वैसे ही टूटते नहीं, हम खुद धीरे-धीरे उन्हें नष्ट करते हैं। आख़िरी शेर फिर उम्मीद भी दे देता है की अगर हम अपनी आँखों में थोड़ी नरमी रख लें, तो शायद चीज़ें बदल सकें।
ReplyDeleteThanks 😊
ReplyDeleteवाह
ReplyDeleteThanks 😊
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