वह दर्पण के सामने खड़ी हो गयी और बोली, “बता दर्पण ! मेरी ख़ूबसूरती के बारे में बता'”
दर्पण ने उसे निहारा और बोला, “आपसे भी खूबसूरत लोग हैं इस नगर में"
उसे गहन संताप हुआ और उसने क्रोधित होकर एक पत्थर उठा लिया और बोली, “बता दर्पण ! अब तूं मेरी ख़ूबसूरती के बारे में बता'”
दर्पण ने पत्थर देख लिया था, जोर से कहा, “आप बहुत खूबसूरत हैं" फिर धीरे से बोला “पर आपसे भी खूबसूरत लोग हैं इस नगर में"
वह प्रथम वाक्य सुनकर इतना विह्वल हुई की द्वितीय वाक्य को सुनी ही नही. और बेचारा दर्पण झूठ बोलने और टूटने से बच गया.

बहुत प्यारी, यथार्थ को बांचती रचना.
ReplyDeletewaah...lovely !
ReplyDeleteप्रभावी लघु कथा |
ReplyDeleteएक कठिन विधा ||
आभार सर जी ||
अच्छा हुआ जो दूसरा वाक्य नहीं सुना ... अच्छी लघु कथा
ReplyDeleteअच्छी लघु कथा है ''दर्पण ने सच भी बोल दिया और टूटनें से भी बच गया । सच्ची और अच्छी लघु कथा है । '' सुनीता जोशी ''
ReplyDeleteसच को सलीके से बोलना बेहतर है !
ReplyDeleteअच्छा हुआ जो दूसरी बात नहीं सुनी ...
ReplyDeleteअच्छी लघु कथा ....
ReplyDeleteसाभार !!
जो चाहता है वही देखना सुनना पसंद करता है मनुष्य !
ReplyDeleteachchhi laghukatha..
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ReplyDeleteman jo sunna chahta hai uske baad aage kuch nahi sunta...b !ahut dino baad aapke blog par ayai hoon...aabhar
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ReplyDeleteसुन्दर बात कह दी आपने। इंसान तारीफ़ का सदा प्यासा है - और यह ही लालच उसे पल भर में अंधा कर देता है।
सच सुनने की ताब सब में कहाँ वे विरले ही होते हैं जो यह कर सकें। बहुत सुंदर कथा।
ReplyDeleteबहुत बहुत अच्छी रचना की प्रस्तुति।
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ReplyDeleteदर्पण झूठ न बोले
ReplyDeleteबहुत खूब!
सुंदर
ReplyDeleteबेहतरीन
ReplyDeleteसच कहु तो मुझे ये कहानी बहुत दिलचस्प लगी। इसमें एक गहरी सच्चाई छिपी है, हम अक्सर वही सुनना चाहते हैं जो हमारे अहंकार को अच्छा लगे, सच्चाई नहीं। दर्पण ने सच कहा था, लेकिन सच हमेशा मीठा नहीं होता। जब उसने झूठ बोलना सीखा, तभी वो टूटने से बच गया, ये बात बहुत प्रतीकात्मक लगी। असल में, यह कहानी बताती है कि इंसान अपनी तारीफ़ में इतना खो जाता है कि सच्चाई सुनने की ताकत खो देता है।
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