Monday, May 31, 2010

इस शहर को फख़्र है बड़प्पन का ~~

कूड़े के ढेर से जीवन चुनता है

दिन भर खुद का बोझ ढोता है

इस शहर को फख़्र है बड़प्पन का

उफ ! यहाँ तो बचपन ऐसे सोता है

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चित्र : मोबाईल कैमरे से

20 comments:

  1. दिल को छू लेनेवाली प्रस्तुति..आभार !

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  2. बहुत मार्मिक और संवेदनशील प्रस्तुति.

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  3. वाह वर्मा जी ,बहुत बढ़िया प्रस्तुती ,इंसानियत की दर्दनाक अवस्था का चित्रण आपके सोच और कोशिस करने की लालसा को दर्शाता है ,जिससे कुछ सुधार हो सके,कास सभी ऐसा सोचते ?

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  4. प्रभावशाली अभिव्यक्ति

    राम राम

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  5. उफ़! बहुत ही मार्मिक कविता.....

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  6. एक कटु सत्य को दर्शाती मार्मिक प्रस्तुति

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  7. चित्रों और शब्दों के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया आपने. आज विकास की राह पर अग्रसर उपभोक्तावाद की काली तस्वीर दिखा दी है आपने.

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  8. उफ़! बहुत ही मार्मिक कविता.....

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  9. मार्मिक, विचारणीय !

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  10. मार्मिक और संवेदनशील प्रस्तुति.

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  11. क्या यह सब उन नेताओ ओर सरकारी अफ़सरो , रिश्वत खोरो को नही दिखता जो इन सब का हक मार कर तंद फ़ुलाये महंगी महंगी कारो मै घुमते है

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  12. कडवी सच्चाई...

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  13. ...अदभुत अभिव्यक्ति!!!

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  14. अभावों से घिरा बचपन मन को पीड़ा देता है लेकिन उस सख्त बिस्तर पर नींद कितनी मीठी होगी यह वही बता सकता है...

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