उसने उस दिन मेरे गाल पर झन्नाटा लिखा था
कोई ताड़ न पाये इसलिये मैनें सन्नाटा लिखा था
.
उसकी गली में आया था कुत्ते पीछे पड़ गये थे
पढ़कर देखते मेरे चेहरे पर ज्वार-भाटा लिखा था
.
चमन में आया था मैं चश्मे-नम करने की ख़ातिर
मेरे भाग्य में तो निगोड़ा यह सूखा कांटा लिखा था
.
यह सोच के मैने गिफ्ट दिया था कि मना करेगी
लेकर बिन बोले चल दी, इतना बड़ा घाटा लिखा था
.
बहुत हौसला लेकर आया था मैं उसकी देहरी पर
पर उसने दरवाजे पर ओके, बाय, टाटा लिखा था
जब लिखा है टाटा
ReplyDeleteतो कैसे न हो घाटा ?
उम्दा और समझदार लोगों के लिए विचारणीय प्रस्तुती /
ReplyDeleteअच्छी और सराहनीय प्रयास
ReplyDeleteगिफ्ट लेने के बाद का टाटा तो बड़े घाटे की बात हो गई..मजेदार और बढ़िया ग़ज़ल..बधाई वर्मा जी
ReplyDeleteयह सोच के मैने गिफ्ट दिया था कि मना करेगी
ReplyDeleteलेकर बिन बोले चल दी, इतना बड़ा घाटा लिखा था
.
बहुत हौसला लेकर आया था मैं उसकी देहरी पर
पर उसने दरवाजे पर ओके, बाय, टाटा लिखा था
हा-हा-हा , भाई साहब, कंजूसी करने की सोचो तो यही नुकशान होता है !
ये तो सच में घाटा हो गया भाई .... आगे के लिए नसीहत है लेकिन ...
ReplyDeleteबहुत बढ़िया गजब की रचना . गिफ्ट देने के पहले दोस्ती करना भी तो जरुरी है सर......आभार
ReplyDeleteयह सोच के मैने गिफ्ट दिया था कि मना करेगी
ReplyDeleteलेकर बिन बोले चल दी, इतना बड़ा घाटा लिखा था.
प्रेमी तो ऐसे ही होते हैं,
ReplyDeleteहमेशा से ही घाटा सहते आएं हैं.
खुशियाँ कभी दूर नहीं होती उनसे,
वह खुद ही हमेशा,
उन्हें टाटा कहते आएं हैं.
मजेदार और बढ़िया ग़ज़ल..
ReplyDeleteउसने उस दिन मेरे गाल पर झन्नाटा लिखा था कोई ताड़ न पाये इसलिये मैनें सन्नाटा लिखा था .......
ARE YAR BAHUT BURA HUWA AAP KE SATH
ReplyDelete:) :) अच्छी हास्य कविता...
ReplyDeleteबहुत ही रोचक और लाजवाब ,,शुरू से अंत तक आनंददायक ,,,
ReplyDeleteपहले झन्नाटा
ReplyDeleteफिर घाटा
और फिर टाटा!
बहुत बेइंसाफ़ी है!!
बी एस पाबला
हा हा हा
ReplyDeleteबहुत अच्छी हास्य गज़ल
bhaut badhiya :}
ReplyDeletemazedaar
ReplyDeletemasaaledar !
ओके, बाय, टाटा !!!!
ReplyDelete(मस्त) :)
वो भी क्या करती...
ReplyDeleteआपकी पतंग पर...वो काटा...जो लिखा था...
जय हिंद...
Dilchasp....
ReplyDeleteमजेदार है जी... :)
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