Thursday, July 22, 2010

भैया देखो, यह बीयर कैन ~~

तथाकथित सभ्य महानगर : दिल्ली

स्थान : आर. के पुरम, सेक्टर 3 का पार्क जो आवासी कालोनी से घिरा हुआ है.

दो बच्चे शीतल पेय के ढक्कनों को इकट्ठा करते हुए. वही बीयर कैन को देखकर खुशी से उछल पडते हैं. शायद यह उन्हें उन ढक्कनों की अपेक्षा ज्यादा आर्थिक लाभ दे जाये.

यह भी तो बचपन है :

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यूँ क्यों भटक रहा है दर-दर

छाँव चाहिये इस बचपन को

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पहचान हमारी बस इतनी कि

बचपन नहीं है पर बच्चे हैं हम

छल, क्षद्म, झूठ का साया है पर

मन के फिर भी सच्चे हैं हम

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नहीं नहीं यह सही नहीं है

हम जो ढूढ रहे हैं यही कहीं है

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चप्पे-चप्पे का अवलोकन

ढूढ रहे हैं बोतल के ढक्कन

भैया देखो, यह बीयर कैन

अब जाकर मिला है चैन

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चित्र : मोबाईल कैमरे से लिया हुआ.

10 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत सही अभिव्‍यक्ति !!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

जीवन का एक रंग यह भी है ही.

ललित शर्मा said...

ये है मेरे देश का बचपन

अच्छी पोस्ट वर्मा जी

नम्स्कार

खुशदीप सहगल said...

जिस देश का बचपन ऐसा है, जवानी कैसी होगी...ये वो बचपन है जो सीधा मजबूरियों के बुढ़ापे में प्रवेश करता है...हर बच्चे को तालीम का हक देने की बात करने वाले कपिल सिब्बल जी को न जाने ये बच्चे कब नज़र आएंगे...

जय हिंद...

Shah Nawaz said...

Behtreen Sir G

महफूज़ अली said...

सटीक अभिव्यक्ति के साथ... सुंदर रचना...

Jyoti said...

सुंदर अभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सोचने पर मजबूर करती पोस्ट

विनोद कुमार पांडेय said...

तरह-तरह के लोग भरे हैं दुनिया में... बचपन का यह एक रूप भी खूब रहा..सुंदर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद

शरद कोकास said...

इसे देखकर समझ आया यूरेका का मतलब ।

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