मैं जिस विद्यालय में कार्यरत हूँ वहाँ का एक पेड़ हवा के एक झोके से टूट गया पर हार नहीं माना. जमीन पर पड़े पड़े अपने वजूद से खुद को जोड़े रखा और फिर से अपनी हरीतिमा को वापस पा लिया और हवा को शुद्ध करने का कार्य अनवरत जारी रखे हुए है. इस जीजीविषा को नमन. आप भी देखें.
सभी चित्र मोबाइल कैमरे से लिया गया है








7 comments:
nice
वाह वर्मा जी..
सच ही कहते हैं लोग कवि की कल्पना की सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती...
विध्वंस में भी निर्माण की कल्पना ..!!
बहुत सुन्दर..!!
हाँ नहीं तो..
वाकई यह जीजिविषा ही है
सुन्दर
चित्र स्वयं बोल रहे हैं!
जीजिविषा ही कही जायेगी...
यही बात मनुष्य के बारे मे हो तो कितना अच्छा ।
शहीद भगत सिंह पर एक रपट यहाँ भी देखें
http://sharadakokas.blogspot.com
Post a Comment