Sunday, March 21, 2010

टूटा हूँ पर टूटा नहीं हूँ

मैं जिस विद्यालय में कार्यरत हूँ वहाँ का एक पेड़ हवा के एक झोके से टूट गया पर हार नहीं माना. जमीन पर पड़े पड़े अपने वजूद से खुद को जोड़े रखा और फिर से अपनी हरीतिमा को वापस पा लिया और हवा को शुद्ध करने का कार्य अनवरत जारी रखे हुए है. इस जीजीविषा को नमन. आप भी देखें.

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सभी चित्र मोबाइल कैमरे से लिया गया है

7 comments:

Suman said...

nice

'अदा' said...

वाह वर्मा जी..
सच ही कहते हैं लोग कवि की कल्पना की सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती...
विध्वंस में भी निर्माण की कल्पना ..!!
बहुत सुन्दर..!!
हाँ नहीं तो..

M VERMA said...
This comment has been removed by the author.
Razia said...

वाकई यह जीजिविषा ही है
सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

चित्र स्वयं बोल रहे हैं!

Udan Tashtari said...

जीजिविषा ही कही जायेगी...

शरद कोकास said...

यही बात मनुष्य के बारे मे हो तो कितना अच्छा ।
शहीद भगत सिंह पर एक रपट यहाँ भी देखें
http://sharadakokas.blogspot.com

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